Friday, July 23, 2010

क्लिंटन की पसंदीदा शायरी

--कुलदीप अविनाश भंडारी



न कत्ल करते हैं, न जीने की दुआ देते हैं,


लोग किस जुर्म की आखिर ये सज़ा देते है ।


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यूं तो मंसूर बने फिरते हैं कुछ लोग,


होश उड जाते हैं जब सिर का सवाल आता है ।


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मुझे तो होश नही, तुमको खबर हो शायद ,


लोग कहते है कि तुम ने मुझ को बर्बाद कर दिया ।


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आखिर काम कर गए लोग ,


सच कहा और मर गए हम लोग ।


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बस्ती मे सारे लोग लहू मे नहा गए,


लह्ज़ा नए खीताब का कितना अजीब था ।


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देखिए गौर से रुक कर किसी चौराहे पर,


जिंदगी लोग लिए फिरते हैं लाशों के तरह ।


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इस नगर मे लोग फिरते है मुखौटे पहन कर,


असल चेहरों को यहां पह्चानना मुमकिन नही ।


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कुछ लोग ज़माने ऐसे भी तो होते हैं ,


महफिल में जो हंसते हैं, तन्हाई मे रोते हैं ।

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