Sunday, October 2, 2011

नीलमधु

नीलमधु
 


अलसी चेतना द्वारा रचित नीलपुष्पी (अलसी) और मधु से बना स्वास्थ्यवर्धक और स्वादिष्ट व्यंजन नीलमधु। विधि इस प्रकार है। पाँच कटोरियाँ लीजिये और उनमें क्रमशः पिसी अलसी, शहद (प्राकृतिक अच्छा रहेगा), मिल्क पॉवडर, कसा हुआ नारियल और बारीक कटे हुए मेवे (बादाम, किशमिश आदि) भर लें। अब सब चीजों को एक थाली में साफ हाथों से अच्छी तरह मिला लीजिये और साफ डिब्बे में भर कर फ्रीज में रख दीजिये। आपका दिव्य नीलमधु तैयार है, इसे रोज सुबह-शाम खाइये। इसे गर्म दूध में मिला कर या मिल्कशेक बना कर भी लिया जा सकता है। इसे आप फेसपेक या उबटन के रूप में भी प्रयोग कर सकते हैं।
यह लंबे समय तक खराब नहीं होता है। यह बच्चों, छात्रों और अकेले रहने वालों के लिए आदर्श व्यंजन है। यह बहुत स्वादिष्ट मिठाई भी है, त्यौहारों पर नकली मावे और डालडा से बनी मिठाईयों का बढ़िया विकल्प है। बना-बनाया नीलमधु कहीं भी उपलब्ध नहीं है। कृपया पतंजली की वेबसाइट या स्टोर्स पर इसे नहीं ढूढ़े।

Tuesday, July 12, 2011

कोशिकीय श्वसन


कोशिकीय श्वसन

मेरे खयाल से हमारे शरीर में होने वाली सबसे महत्वपूर्ण रसायनिक क्रिया कोशिकीय श्वसन है। इसी क्रिया द्वारा हम भोजन के मुख्य तत्वों (कोर्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा) विशेष तौरपर ग्लूकोज से विभिन्न शारीरिक गतिविधियों के लिए ऊर्जा प्राप्त करते हैं। यदि हम कोशिकीय श्वसन को एक समीकरण व्यक्त करें तो ग्लूकोज का एक अणु ऑक्सीजन के छः अणुओं से क्रिया करता है और कार्बन डाइ-ऑक्साइड के छः अणु, जल के छः अणु और ऊर्जा उत्पन्न होती है। इसी ऊर्जा से महा शक्तिमान अणु ए.टी.पी. बनता है और थोड़ी ऊष्मा (Heat) भी पैदा होती है। यह ए.टी.पी. ही जीवन की मुद्रा या ईंधन है, उसी तरह जैसे हमारी गाड़ियों का ईंधन पेट्रोल है। इस ऊर्जा को फोस्फेट ऊर्जा भी कहते हैं। आदर्श स्थितियों में ग्लूकोज के एक अणु से 38 ए.टी.पी. बनते हैं। संपूर्ण जीव जगत में सारी आवश्यक शारीरिक क्रियाओं (जैसे माँस पेशियों का संकुचन, नाड़ियों कों विद्युत संदेश भेजना आदि) को सम्पन्न करने के लिए ऊर्जा इसी ए.टी.पी. से मिलती है। कोशिकीय श्वसन-क्रिया की निम्न प्रमुख अवस्थाएँ हैं।

• ग्लाइकोलिसिस

• क्रेब्स साइकिल

• इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला

• खमीरीकरण

ग्लाइकोलिसिस

ग्लाइकोलिसिस (ग्लाइकोस =ग्लूकोज का पुराना नाम और लाइसिस=विघटन या टूटना) ग्लूकोज का चयापचय पथ है जिसमें ग्लूकोज C6H12O6 का एक अणु टूट कर पाइरुवेट (तीन कार्बन का एक अणु) CH3COCOO- + H+ के दो अणुओं में विभाजित हो जाता है। ग्लूकोज (Gluc=Sweet and ose=sugar) छः कार्बन का एक छल्ला होता है, जिस पर हाइड्रोजन के 12 परमाणु और ऑक्सीजन के 6 परमाणु जुड़े रहते हैं। इस क्रिया में उत्पन्न ऊर्जा से ए.टी.पी. (एडीनोलाइन ट्राइफोस्फेट) और एन.ए.डी.एच. (रिड्यूस्ड निकोटिनेमाइड एडीनीन डाइन्युक्लियोटाइड) के दो-दो अणु बनते हैं। यह क्रिया कोशिका-द्रव्य में होती है। ग्लाइकोसिस के विभिन्न चरणों का पता एम्बडेन, मेयरहॉफ एवं पर्नास नामक तीन वैज्ञानिकों ने लगाया था। इसलिए श्वसन की इस अवस्था को इन तीनों वैज्ञानिकों के नाम के आधार पर इ.एम.पी. पथ भी कहते हैं। इस क्रिया के लिए ऑक्सीजन जरूरी नहीं होती है, या यह श्वसन-क्रिया की अवायवीय अवस्था है। इस क्रिया के प्रारंभ में ए.टी.पी. के दो अणु खर्च होते हैं या सरल शब्दों में ए.टी.पी. के दो अणु निवेश करने पड़ते हैं। लेकिन इस क्रिया के अगले चरणों में ए.टी.पी. के चार अणु और NADH के दो अणु बनते हैं, यानी NADH के दो अणु और ए.टी.पी. के दो अणुओं का फायदा होता है। कोशिकीय श्वसन की इस प्रारंभिक अवस्था के रसायनिक कार्य-पथ में दस चरण होते हैं। पहले तीन चरणों को निवेश निवेश चरण कहते हैं। चौथे और पाँचवें चरण में ग्लूकोज का विघटन होता है और आखिरी पाँच चरणों (Pay off steps) में ऊर्जा की उत्पत्ति होती है, जिनको फलदायक चरण कहते हैं।

पहला चरण

इस चरण में हेग्जोकाइनेज एंजाइम ए.टी.पी. से एक फॉस्फेट घटक लेकर ग्लूकोज को देता है और ग्लूकोज 6-फॉस्फेट बनता है। अर्थात ग्लूकोज का फॉस्फरसीकरण होता है और ए.टी.पी. अपना एक फॉस्फेट देकर ए.डी.पी. में परिवर्तित हो जाता है। यह चरण अपरिवर्तनीय है।

Glucose (C6H12O6) + hexokinase + ATP → ADP + Glucose 6-phosphate (C6H11O6P1)

दूसरा चरण


दूसरे चरण में फॉस्फोग्लूकोआइसोमरेज एंजाइम पहले तो ग्लूकोज 6-फॉस्फेट के छल्ले को तोड़ कर एक लंबी श्रंखला का रूप दे देता है। फिर यही एंजाइम ग्लूकोज 6-फॉस्फेट के कार्बोनिल ग्रुप को पहले कार्बन से हटा कर दूसरे कार्बन से जोड़

देता है। इस क्रिया के लिए एक जल के अणु की जरूरत पड़ती है, जो अपना एक हाइड्रोजन ऑयन कार्बोनिल ग्रुप में ऑक्सीजन को भैंट कर देता है। दूसरे कार्बन के कार्बोक्सिल ऑयन से एक हाइड्रोजन अलग होता है और एक जल का अणु बनता है। इस तरह फ्रुक्टोज 6-फॉस्फेट बनता है जिसे यही एंजाइम पुनः छल्ले का रूप दे देता है। यह एक परिवर्तनीय (Reversible) क्रिया है और सामान्यतः आगे ही चलती है परन्तु यदि फ्रुक्टोज 6-फॉस्फेट का स्तर बढ़ जाये तो यह विपरीत दिशा में भी जा सकती है। फ्रुक्टोज भी इसी चरण में ग्लाइकोलिसिस कार्य-पथ में प्रवेश कर सकता है।

Glucose 6-phosphate (C6H11O6P1) + Phosphoglucoisomerase → Fructose 6-phosphate (C6H11O6P1)

तीसरा चरण

इस अपरिवर्तनीय चरण में फॉस्फोफ्रुक्टोकाइनेज एंजाइम ए.टी.पी. से एक और फॉस्फेट घटक लेकर फ्रुक्टोज 6-फॉस्फेट को देता है अर्थात उसका फॉस्फरसीकरण करता है और फ्रुक्टोज 1,6-बिसफॉस्फेट बनाता है। ए.टी.पी. फॉस्फेट घटक देकर ए.डी.पी. में परिवर्तित हो जाता है। यह चरण ग्लाइकोलिसिस प्रक्रिया के नियंत्रण की प्रमुख कड़ी है।

Fructose 6-phosphate (C6H11O6P1) + phosphofructokinase + ATP → ADP + Fructose 1, 6-diphosphate (C6H10O6P2)

चौथा चरण

इस चरण में पहले तो फ्रुक्टोज 1,6-बिसफॉस्फेट का छल्ला टूटता है फिर एलडोलेज एंजाइम इसे तीन कार्बन वाले ग्लीसरेल्डिहाइड 3-फॉस्फेट और डाइहाइड्रोएसीटोन फॉस्फेट अणुओं में विभाजित कर देता है।

Fructose 1, 6-diphosphate (C6H10O6P2) + aldolase → Glyceraldehyde 3-phosphate (C3H5O3P1) +

Dihydroxyacetone phosphate (C3H5O3P1)

पाँचवाँ चरण

इस चरण ट्रायोजफॉस्फेट आइसोमरेज एंजाइम डाइहाइड्रोएसीटोन फॉस्फेट का विन्यास-परिवर्तन (Isomerisation) कर ग्लीसरेल्डिहाइड 3-फॉस्फेट बना देता है। विन्यास-परिवर्तन में यौगिक का सूत्र तो वही रहता है बस परमाणुओं की स्थिति बदल जाती है। इस चरण का परिणाम होता है ग्लीसरेल्डिहाइड 3-फॉस्फेट के दो अणु, अर्थात आगे की सारी क्रियाएँ दो बार होंगी।

Dihydroxyacetone phosphate (C3H5O3P1) + triosephosphate isomerase → Glyceraldehyde 3-phosphate (C3H5O3P1)

छठा चरण

इस चरण में ग्लीसरेल्डिहाइड 3-फॉस्फेट डीहाइड्रोजिनेज एंजाइम NAD+ और फॉस्फेट ग्रुप द्वारा ग्लीसरेल्डिहाइड 3-फॉस्फेट को ऑक्सीकृत करता है और 1,3-बिसफॉस्फोग्लीसरेट तथा NADH बनते हैं।

2 glyceraldehyde 3-phosphate (C3H5O3P1) + 2 H- + 2 NAD+Glyderaldehyde phosphate dehydrogenase → 2 NADH + 2 H+ 2 molecules of 1,3-bisphoshoglycerate (C3H4O4P2)

सातवाँ चरण

सातवें चरण में फॉस्फोग्लीसरेट काइनेज एंजाइम 1,3-बिसफॉस्फोग्लीसरेट से फॉस्फेट ग्रुप लेकर ए.डी.पी. को दे देते हैं और ए.टी.पी. बनता है। 1,3-बिसफॉस्फोग्लीसरेट फॉस्फेट ग्रुप त्याग कर 3-फॉस्फोग्लीसरेट बनता है। चूँकि ग्लूकोज के एक अणु के लिए यह क्रिया दो बार होती है अतः इस चरण में दो ए.टी.पी. बनते हैं। पहले और तीसरे चरण में हमने दो ए.टी.पी. निवेश किये थे और दो हमें वापस मिल गये हैं अर्थात इस चरण में हम लाभ-हानि की दृष्टि से बराबर हो जाते हैं। यदि कोशिका में पर्याप्त ए.टी.पी. होते हैं तो यह क्रिया संपन्न नहीं होती है क्योंकि ए.टी.पी. जल्दी बेकार हो जाते हैं।

2 molecules of 1,3-diphoshoglyceric acid (C3H4O4P2) + phosphoglycerokinase + 2 ADP → 2 molecules of 3-phosphoglycerate (C3H5O4P1) + 2 ATP

आठवाँ चरण

आठवें चरण में फॉस्फोग्लीसरोम्यूटेज एंजाइम 3-फॉस्फोग्लीसरेट में फॉस्फेट ग्रुप को तीसरे कार्बन से हटा कर दूसरे कार्बन से जोड़ देता है अर्थात विन्यास परिवर्तन होता है और फलस्वरूप 2-फॉस्फोग्लीसरिक एसिड बनता है।

2 molecules of 3-Phosphoglycerate (C3H5O4P1) + phosphoglyceromutase → 2 molecules of 2-Phosphoglyceric acid (C3H5O4P1)

नवाँ चरण

नवें चरण में इनोलेज एंजाइम 2-फॉस्फोग्लीसरिक एसिड का निर्जलीकरण करता है और फॉस्फोइनोलपाइरुवेट बनता है।

2 molecules of 2-Phosphoglyceric acid (C3H5O4P1) + enolase → 2 molecules of phosphoenolpyruvate (PEP) (C3H3O3P1)

दसवाँ चरण

दसवें और आखिरी चरण में पाइरुवेट काइनेज एंजाइम फॉस्फोइनोलपाइरुवेट से फॉस्फेट ग्रुप लेकर ए.डी.पी. को देता है फलस्वरूप पाइरुवेट और ए.टी.पी. बनता है।

2 molecules of PEP (C3H3O3P1) + pyruvate kinase + 2 ADP → 2 molecules of pyruvic acid (C3H4O3) + 2 ATP

इस तरह हमने देखा कि एक ग्लूकोज के एक अणु से ए.टी.पी. के दो अणु और NADH के दो अणु का फायदा होता है। पाइरुवेट और NADH श्वसन-क्रिया की आगे की अवस्थाओं में काम आते हैं।

क्रेब्स चक्र

ग्लाइकोलिसिस के बाद कोशिकीय श्वसन-क्रिया एक और जीवरसायनिक क्रिया चक्र में प्रवेश करती है, जिसे क्रेब्स-चक्र या सिट्रिक एसिड सायकिल या ट्राइकोर्बेक्सिलिक एसिड सायकिल भी कहते हैं। हमने देखा कि किस प्रकार ग्लाइकोलिसिस प्रक्रिया में ग्लूकोज का एक अणु टूट कर पाइरुविक एसिड के दो अणुओं में विभाजित होता है। इसके बाद की क्रियाएँ वायवीय हैं अर्थात ऑक्सीजन की उपस्थिति जरूरी होती है और ये माइटोकोन्ड्रिया में संपन्न होती हैं। क्रेब्स-चक्र में प्रवेश करने के पहले पाइरुवेट डिहाइड्रोजिनेज एंजाइम पाइरुविक एसिड (3 Carbon Molecule) का विघटन करता है, एक कार्बन का परमाणु कार्बन डाइ-ऑक्साइड के रूप में अलग हो जाता है तथा शेष बचे दो कार्बन कोएन्जाइम-ए से जुड़ते हैं और एसीटाइल-कोएन्जाइम-ए या एसीटाइल-कोए (acetyl-coenzyme A or acetyl-CoA) बनता है। इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रोन और हाइड्रोजन ऑयन NAD से जुड़ कर शक्तिशाली ऊर्जा-वाहक NADH बनाते हैं। यह प्रक्रिया क्रेब्स-चक्र का हिस्सा नहीं है बल्कि ग्लाइकोलिसिस और क्रेब्स-चक्र के बीच की कड़ी है।

क्रेब्स-चक्र का प्रारंभ एसीटाइल-कोए (2 Carbon का अणु) से होता है। क्रेब्स-चक्र वायवीय-श्वसन की मुख्य धुरी है। एसीटाइल-कोए के स्रोत ग्लाइकोलिसिस के अलावा अमाइनो एसिड और फैटी एसिड्स भी हो सकते हैं। एसीटाइल-कोए (2 Carbon) ऑग्जेलोएसीटिक एसिड (4 Carbon) से क्रिया कर सिट्रिक एसिड (6 Carbon) बनाता है। सिट्रिक एसिड कई एंजाइम्स की मदद से दस विभिन्न रसायनिक क्रियाओं या कड़ियों द्वारा एक चक्र-पथ से गुजरता है। कई कड़ियों में उच्च ऊर्जावान इलेक्ट्रोन निकलते हैं, जिन्हें इलेक्ट्रोन-अभिग्राहक NAD ग्रहण कर लेता है और हाइड्रोजन (प्रोटोन्स) से जुड़ कर ऊर्जा-वाहक तत्व NADH बनते हैं। एक कड़ी में इलेक्ट्रोन-अभिग्राहक FAD होते हैं जो दो हाइड्रोजन से जुड़ कर ऊर्जा-वाहक तत्व FADH2 बन जाते हैं। एक कड़ी में ऊर्जा उत्पन्न होती है और ATP का एक अणु बनता है। चूँकि एक ग्लूकोज के अणु से दो पाइरुवेट बनते हैं और क्रेब्स-चक्र में प्रवेश करते हैं अतः कुल दो ATP के अणु बनते हैं।

इस चक्र में एसीटाइल-कोए के एक अणु से दो कार्बन अलग होते हैं और दो CO2 के अणु बनते हैं। चूँकि चक्र में कुल दो सीटाइल-कोए प्रवेश करते हैं, इसलिए कुल चार कार्बन अलग होते हैं और CO2 के चार अणु बनते हैं। यदि इसमें पाइरुवेट से एसीटाइल-कोए बनने की प्रक्रिया में बनने वाले CO2 के दो अणुओं को भी जोड़ दें तो कुल हुए छः अणु अर्थात एक चक्र में कुल छः कार्बन CO2 के रूप में विसर्जित हुए।

क्रेब्स-चक्र का अंतिम उत्पाद भी ऑग्जेलाएसिटिक एसिड है, जो पुनः एसीटाइल-कोए के साथ मिल कर चक्र की अगली पारी में प्रवेश करता है। यदि एक क्रेब्स-चक्र का लेखा-जोखा देखें तो उसमें कुल दो ATP, दस NADH और दो FADH2 बनते हैं। NADH और FADH2 उच्च ऊर्जा-वाहक तत्व हैं जो इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला (जो माइटोकॉंड्रिया की आंतरिक झिल्ली में संपन्न होती है) में ऊर्जा (ATP के रूप में) के निर्माण में योगदान करते हैं। एक NADH तीन और एक FADH2 दो ATP बनाता है।

क्रिया 1 सिट्रिक एसिड का निर्माण

साइट्रेट सिंथेज एंजाइम की उपस्थिति में एसीटाइल-कोए और ऑग्जेलाएसिटिक एसिड संघनित होकर सिट्रिक एसिड बनाते हैं। एसीटाइल ग्रुप CH3COO एसीटाइल-कोए से अलग होकर ऑग्जेलाएसिटिक एसिड के कीटोन कार्बन से जुड़ जाता है, जो अल्कॉहल में परिवर्तित हो जाता है। सरल शब्दों में दो कार्बन का अणु चार कार्बन के अणु से मिल कर छः कार्बन अणु सिट्रिक एसिड बन जाता है और कोए ग्रुप अलग हो जाता है।

Oxaloacetic Acid + Acetyl CoA + H2O --> Citric Acid + CoA-SH (citrate synthase)

क्रिया 2 अल्कॉहल का निर्जलीकरण

अगली दो कड़ियों में सिट्रिक एसिड का -OH ग्रुप तीसरे कार्बन से अलग होकर दूसरे कार्बन से जुड़ जाता है अर्थात आणविक विन्यास बदल जाता है। इस कड़ी में एकोनाइटेज एंजाइम की उपस्थिति में अल्कॉहल का निर्जलीकरण होता है और फलस्वरूप एकोनाइटिक एसिड बनता है जो अगली कड़ी तक एकोनाइटेज एंजाइम से चिपका रहता है।

Citric Acid --> Aconitic Acid + H2O (aconitase)

क्रिया 3 अल्कॉहल निर्माण हेतु पुनर्जलीकरण

इस कड़ी में एकोनाइटिक एसिड का पुनर्जलीकरण होता है, -OH ग्रुप तीसरे कार्बन से हट कर दूसरे कार्बन से जुड़ जाता है और आइसोसिट्रिक एसिड बनता है।

Aconitic Acid + H2O --> Isocitric Acid (aconitase)

क्रिया 4 ऑक्सीकरण

यह पहली ऑक्सीकरण क्रिया है जिसमे अल्कॉहल कीटोन में परिवर्तित हो जाता है और दो हाइड्रोजन और दो इलेक्ट्रोन NAD+ को प्राप्त होते हैं तथा NADH + H+ बनता है, जो श्वसन की अगली अवस्था इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला में प्रवेश करता है। इस क्रिया में ऑग्जेलासक्सीनिक एसिड बनता है और अगली कड़ी तक आइसोसिट्रेट डीहाइड्रोजिनेज एंजाइम से चिपका रहता है।

Isocitric Acid + NAD+ + 2H + e- --> Oxalosuccinic Acid + NADH + H + (isocitrate dehydrogenase)

क्रिया 5 अकार्बनीकरण (Decarboxylation)

यह अकार्बनीकरण की पहली कड़ी है जिसमें कार्बन डाइ-ऑक्साइड के रूप में एक कार्बन का नुकसान होता है। फलस्वरूप बनने वाले अणु में पाँच कार्बन ही बचते हैं जिसे अल्फा-कीटोग्लुटेरिक एसिड कहते हैं। स्वाभाविक है यह क्रिया आइसोसिट्रेट डीहाइड्रोजिनेज एंजाइम द्वारा ही संपन्न होती है।

Oxalosuccinic Acid --> a-Ketoglutaric Acid + CO2 (isocitrate dehydrogenase)

क्रिया 6 ऑक्सीकरण, अकार्बनीकरण थायोल इस्टर निर्माण

तीन एंजाइम्स अल्फा-कीटोग्लूटारेट डीहाइड्रोजिनेज कॉम्प्लेक्स की मदद से संचालित यह एक जटिल ऑक्सीकृत अकार्बनीकरण प्रक्रिया है जो इस पूरे चक्र की एकमात्र अपरिवर्तनीय कड़ी है और चक्र को विपरीत दिशा में नहीं जाने देती है। इस चक्र की यह दूसरी ऑक्सीकरण क्रिया है जिसमें अल्कॉहल कीटोन में परिवर्तित होता है। यहाँ भी दो हाइड्रोजन और दो इलेक्ट्रोन्स NAD+ को प्राप्त होते हैं तथा NADH + H+ बनता है जो इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला में प्रवेश करता है।

यह अकार्बनीकरण की दूसरी कड़ी है जिसमें कार्बन डाइ-ऑक्साइड के रूप में एक कार्बन का नुकसान होता है। इस कड़ी की समाप्ति तक सिट्रिक एसिड के दो कार्बन अलग होकर CO2 के रूप में साथ छोड़ चुके होते हैं। फलस्वरूप बचा हुआ चार कार्बन का अणु CoA थायोल इस्टर से ऊर्जावान बंध द्वारा जुड़ कर सक्सीनाइल कोए बनता है।

α-Ketoglutaric Acid + NAD+ + CoA-SH --> Succinyl-CoA + NADH + H+ + CO2 (α-ketoglutarate dehydrogenase)

क्रिया 7 सक्सीनाइल कोए का जलीकरण व ए.टी.पी. का निर्माण

इस क्रिया में सक्सीनाइल कोए के थायोल इस्टर ऊर्जावान बंध का जलीकरण होता है, ऊर्जा की उत्पत्ति होती है और जी.डी.पी. का अणु फोस्फोरस से जुड़ कर एक जी.टी.पी. में परिवर्तित हो जाता है। इस पूरे चक्र में जी.टी.पी. का सीधा निर्माण यहीं होता है। इस क्रिया में सक्सीनिक एसिड बनता है।

Succinyl-CoA + GDP + Pi --> Succinic Acid + CoA-SH + GTP (succinyl-CoA synthetase)

क्रिया 8 ऑक्सीकरण

इस कड़ी में सक्सीनेट डीहाइड्रोजिनेज एंजाइम की उपस्थिति में एक अलग तरह का ऑक्सीकरण होता है, जिसमें सक्सीनिक एसिड से हाइड्रोजन अलग हो जाते हैं और FAD से क्रिया कर FADH2 बनाते हैं। इस क्रिया के अत में फ्यूमरिक एसिड बनता है।

Succinic Acid + FAD --> Fumaric Acid + FADH2 (succinate dehydrogenase)

क्रिया 9 अल्कॉहल निर्माण हेतु जलीकरण

इस कड़ी में फ्यूमरेज एंजाइम की उपस्थिति में फ्यूमरिक एसिड का जलीकरण होता है और मेलिक एसिड बनता है।

Fumaric Acid + H2O --> Malic Acid (fumarase)

क्रिया 10 ऑक्सीकरण

इस कड़ी में मेलेट डीहाइड्रोजिनेज एंजाइम मेलिक एसिड का ऑक्सीकरण करता है और ऑग्जेलाएसिटिक एसिड बनाता है। दो हाइड्रोजन और दो इलेक्ट्रोन NAD+ को प्राप्त होते हैं तथा NADH + H+ बनता है, जो इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला में प्रवेश करता है।

Malic Acid + NAD+ --> Oxaloacetic Acid + NADH + H+ (malate dehydrogenase)

इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला

इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला कोशिकीय-श्वसन की अन्तिम अवस्था है। यह कई जटिल प्रोटीन संरचनाओं की एक श्रंखला है जो माइटोकॉंड्रियम की आंतरिक झिल्ली में स्थित होती है। इनमें कुछ इलेक्ट्रोन दानकर्ता (जैसे NADH और FADH2) तो कुछ इलेक्ट्रोन अभिग्राहक (जैसे O2) के रूप में कार्य करती हैं, जिनके बीच इलेक्ट्रोन्स का आदान-प्रदान होता है और इलेक्ट्रोन्स एक संरचना से दूसरी संरचना को थमा दिये जाते हैं। इस तरह इलेक्ट्रोन्स आंतरिक झिल्ली में स्थित जटिल प्रोटीन संरचनाओं से गुजरते हुए चरण दर चरण ऊर्जा बाँटते हुए आगे बढ़ते हैं और यह ऊर्जा हाइड्रोजन ऑयन (या प्रोटोन) को मेट्रिक्स से बाहर पंप करती है। आंतरिक झिल्ली के बाहर हाइड्रोजन ऑयन की संख्या बढ़ती जाती है और बाहर विद्युत-रसायन दबाव बहुत बढ़ जाता है जो हाइड्रोजन ऑयन को ए.टीपी. सिन्थेज में होकर अंदर जाने के लिए विवश करता है। ध्यान रहे माइटोकॉंड्रियम की आंतरिक झिल्ली हाइड्रोजन ऑयन्स के लिए पूर्णतः अपारगम्य होती है। हाइड्रोजन ऑयन के अंतरझिल्लीय कक्ष (बाहरी और आंतरिक झिल्ली के बीच का स्थान) में प्रवेश से जो ऊर्जा निकलती है वह ए.टी.पी. बनाती है।

माइटोकॉंड्रियम की संरचना

इस प्रक्रिया को अच्छी तरह समझने के लिए हमें माइटोकॉंड्रियम की संरचना को समझ लेना चाहिये। माइटोकॉंड्रिया कोशिका-द्रव्य में स्थित सूक्ष्म ऊर्जा-उत्पादक इकाइयाँ हैं और एक कोशिका में कई माइटोकॉंड्रिया पाये जाते हैं। माइटोकॉंड्रिया कोशिका की लगभग आत्मनिर्भर महत्वपूर्ण संरचना है। ये अपनी इच्छा से कोशिका-द्रव्य में विचरण कर सकते हैं, आकार बदल सकते हैं, विभाजित हो सकते हैं, अपने लिए डिज़ाइनर प्रोटीन बना सकते हैं और इनका अपना अलग डी.एन.ए. भी होता है। माँस-पेशी, हृदय और मस्तिष्क की कोशिकाओं में बहुत ज्यादा माइटोकॉंड्रिया होते हैं क्योंकि इनको बहुत सारी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। शरीर की विभिन्न क्रिया-कलापों के लिए आवश्यक ऊर्जा (ए.टी.पी.) का निर्माण मुख्यतः यहीं होता है। इसमें एक बाहरी झिल्ली या भित्ति होती है और एक घुमावदार आन्तरिक झिल्ली होती है। आन्तरिक झिल्ली के घुमाव या सलवटों को क्रिस्टे कहते हैं। आन्तरिक झिल्ली के भीतर के कक्ष को मेट्रिक्स कहते हैं, जिसमें माइटोकॉंड्रियल डी.एन.ए., राइबोजोम्स, एंजाइम्स और टीआर.एन.ए. स्थित होते हैं। दोनों झिल्लियों के बीच के स्थान को अन्तरझिल्लीय कक्ष कहते हैं। इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला आन्तरिक झिल्ली में ही संपन्न होती है।

ग्लाइकोलिसिस और क्रेब्स चक्र में हमने देखा कि एक ग्लूकोज के अणु से दस उच्च ऊर्जा-वाहक तत्व NADH और दो FADH2 बनते हैं, जो इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला में मुख्य इलेक्ट्रोन दानदाता के रूप में कार्य करते हैं। औसतन एक NADH तीन और एक FADH2 दो ATP बनाता है। इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला माइटोकॉंड्रियम की आंतरिक झिल्ली में संपन्न होती है, जिसके निम्न घटक या कॉम्प्लेक्स होते हैं।

एन.ए.डी.एच. डीहाइड्रोजिनेज या कॉम्प्लेक्स I

कॉम्प्लेक्स I या एन.ए.डी.एच. ऑक्सीडोरिडक्टेज या डीहाइड्रोजिनेज एंजाइम, जो इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला का पहला प्रोटीन है, अंग्रेजी के अक्षर L के आकार का और अपेक्षाकृत बड़ा होता है और इसमें कम से कम 46 प्रोटीन इकाइयाँ और FMN और Fe-S क्लस्टर होते हैं। संक्षेप में यह एंजाइम NADH से दो इलेक्ट्रोन अलग करता है और उसे NAD+ के रूप में ऑक्सीकृत करता है और ये दोनों इलेक्ट्रोन कोएंजाइम क्यू-10 (ubiquinone) या Q का अपघटन कर यूबीक्विनोल या QH2 बनाते हैं। इस क्रिया में 2 हाइड्रोजन मेट्रिक्स से लिये जाते हैं और 2 हाइड्रोजन अन्तरझिल्लीय कक्ष में पंप कर दिये जाते हैं। इस मुख्य क्रिया को निम्न समीकरण में दर्शाया जा सकता है।

NADH + 1H+ + Q + 2H+मेट्रिक्स à NAD+ + QH2 + 2H+अन्तरझिल्लीय

इस क्रिया में सबसे पहले NADH कॉम्प्लेक्स I से संपर्क करता है और दो ऊर्जावान इलेक्ट्रोन कॉम्प्लेक्स I को देकर NAD+ के रूप में ऑक्सीकृत होता है। NAD+ क्रेब्स चक्र में पुनः चक्रित हो जाता है। ये दोनों इलेक्ट्रोन कॉम्प्लेक्स I के उपघटक फ्लेमिन मोनोन्युक्लियोटाइड (FMN) को अपघटित कर FMNH2 बनाते हैं। यहाँ मैं आपको बतला दूँ कि ऑक्सीकरण का मतलब ऑक्सीजन से जुड़ना और अपघटन का मतलब हाइड्रोजन से जुड़ना होता है। इलेक्ट्रोन की दृष्टि से देखें तो इलेक्ट्रोन का अलग होना ऑक्सीकरण है और इलेक्ट्रोन से जुड़ना अपघटन है। इसके बाद इलेक्ट्रोन लोह व गंधक युक्त यौगिकों (Fe-S क्लस्टर्स) से क्रिया करते और ऊर्जा दान करते-करते आगे बढ़ते हैं। कॉम्प्लेक्स I में [2Fe–2S] और [4Fe–4S] दोनों तरह के Fe-S क्लस्टर्स होते हैं। FMNH2 पहले Fe-S क्लस्टर्स को एक इलेक्ट्रोन देकर FMNH• के रूप में अपघटित करता है। FMNH• अगले Fe-S क्लस्टर को इलेक्ट्रोन देकर उसे भी अपघटित करता है। इस क्रिया को निम्न समीकरणों में दर्शाया गया है।

FMNH2 + (Fe-S)ox à FMNH• + (Fe-S)red + H+

FMNH• + (Fe-S)ox à FMN + (Fe-S)red + H+

इलेक्ट्रोन के परिवहन से उत्पन्न ऊर्जा दो हाइड्रोजन ऑयन मेट्रिक्स से उठा कर अन्तरझिल्लीय कक्ष में पंप कर देती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि हाइड्रोजन ऑयन का अन्तरझिल्लीय कक्ष में पंप होना और कॉम्प्लेक्स I में से इलेक्ट्रोन का गुजरना दोनों क्रियाएँ एक दूसरे से जुड़ी हैं। यदि आप हाइड्रोजन ऑयन को अन्तरझिल्लीय कक्ष में जाने से रोक देते हैं तो इलेक्ट्रोन भी कॉम्प्लेक्स I को पार नहीं कर पायेंगे या इलेक्ट्रोन को कॉम्प्लेक्स I से गुजरने नहीं देंगे तो हाइड्रोजन ऑयन भी अन्तरझिल्लीय कक्ष को पार नहीं कर पायेंगे। दोनों क्रियाओं का साथ घटित होना नियम है।

कोएंजाइम क्यू

इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला में इलेक्ट्रोन-वाहक एक विशिष्ट अणु से ही इलेक्ट्रोन ग्रहण कर सकते हैं। गतिशील इलेक्ट्रोन Fe-S क्लस्टर की श्रंखला से गुजरते हुए कोएंजाइम क्यू को स्थानांतरित कर दिये जाते हैं। कोएंजाइम क्यू दो इलेक्ट्रोन ग्रहण करते है और मेट्रिक्स से दो हाइड्रोजन ऑयन भी उठाते हैं और QH2 रूप में अपघटित (Reduced) हो जाते हैं।

सक्सीनेट-क्यू ऑक्सीडोरिडक्टेज या कॉम्प्लेक्स II

सक्सीनेट-क्यू ऑक्सीडोरिडक्टेज या कॉम्प्लेक्स II या सक्सीनेट डिहाइड्रोजिनेज इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला का दूसरा प्रवेश द्वार है। लेकिन यह असामान्य है क्योंकि यह क्रेब्स-चक्र और इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला दोनों में कार्य करता है। कॉम्प्लेक्स II में चार प्रोटीन उपइकाइयाँ, फ्लेविन एडिनीन डाइन्युक्लियोटाइड (FAD) उपघटक, Fe-S क्लस्टर और एक हीम समूह होता है। हीम समूह इलेक्ट्रोन परिवहन में कोई सहायता नहीं करता है। कॉम्प्लेक्स II सक्सीनेट को फ्यूमरेट में ऑक्सीकृत करता है और इस क्रिया से निकले इलेक्ट्रोन FAD को अपघटित कर FADH2 बनाते हैं। इलेक्ट्रोन FADH2 से निकल कर Fe-S क्लस्टर की श्रंखला से गुजरते हुए कोएंजाइम क्यू को स्थानांतरित कर दिये जाते हैं। कोएंजाइम क्यू दो इलेक्ट्रोन ग्रहण करते है और मेट्रिक्स से दो हाइड्रोजन ऑयन भी उठाते हैं और QH2 रूप में अपघटित (Reduced) हो जाते हैं। इस क्रिया में NADH के ऑक्सीकरण की अपेक्षा बहुत कम ऊर्जा उत्पन्न होती है इसलिए कॉम्प्लेक्स II हाइड्रोजन ऑयन को अन्तरझिल्लीय कक्ष में पंप नहीं कर पाता है। कॉम्प्लेक्स II की मुख्य क्रिया को निम्न समीकरण द्वारा दर्शाया जा सकता है।

Succinate + Q à Fumarate + QH2

क्यू-साइटोक्रोम सी ऑक्सीडोरिडक्टेज या साइटोक्रोम बी-सी1 या कॉम्प्लेक्स III

क्यू-साइटोक्रोम सी ऑक्सीडोरिडक्टेज को साइटोक्रोम बी-सी1 कॉम्प्लेक्स या कॉम्प्लेक्स III भी कहते हैं। यह एंजाइम दो प्रोटीन खंडो से बना होता है, हर खंड में 11 प्रोटीन इकाइयाँ, Fe-S क्लस्टर्स, और तीन साइटोक्रोम (एक साइटोक्रोम सी1 और दो बी साइटोक्रोम) होते हैं। साइटोक्रोम एक प्रोटीन होता है जो इलेक्ट्रोन का स्थानांतरण करने में सक्षम होता है और इसमें कम से कम एक हीम घटक होता है। हीम घटक के मध्य में लोह अणु होते हैं, जो इलेक्ट्रोन के स्थानांतरण के आधार पर अपघटित फैरस (+2) या ऑक्सीकृत फैरिक (+3) के रूप में हो सकते हैं।

साइटोक्रोम बी-सी1 की मुख्य क्रिया में यूबीक्विनोन या कोएंजाइम क्यू के एक अणु का ऑक्सीकरण और कोएंजाइम क्यू के साइटोक्रोम सी (यह एक छोटा सा हीम युक्त प्रोटीन है) के दो अणुओं का अपघटन होता है। साइटोक्रोम सी एक बार में एक ही इलेक्ट्रोन को स्थानांतरित करता है। निम्न समीकरण से यह क्रिया स्पष्ट हो जाती है।

QH2 + 2Cyt cox + 2H+matrix à Q + 2Cyt cred + 4H+intermembrane

चूँकि एक बार में एक ही इलेक्ट्रोन का साइटोक्रोम सी द्वारा स्थानांतर हो सकता है, इसलिए कॉम्प्लेक्स III में यह क्रिया दो चरणों में होती है और इसे क्यू-चक्र कहते हैं। पहले चरण में एंजाइम तीन पदार्थों से संपर्क करता है। पहला है QH2 जो ऑक्सीकृत होता है और एक इलेक्ट्रोन साइटोक्रोम सी को देता है। QH2 से दो हाइड्रोजन ऑयन (या प्रोटोन) अलग होकर अन्तरझिल्लीय कक्ष में प्रवेश कर जाते हैं। तीसरा पदार्थ है Q जो QH2 से दूसरा इलेक्ट्रोन लेकर अपघटित होकर Q- बनता है, जो एक मुक्त कण है और जिसे यूबीसेमीक्विनोन कहते हैं । पहले दो तत्व तो अलग हो जाते हैं लेकिन यूबीसेमीक्विनोन इस एंजाइम से बंधा रहता है।

दूसरे चरण में QH2 का दूसरा अणु एक इलेक्ट्रोन तो साइटोक्रोम सी को देता है और दूसरा इलेक्ट्रोन मेट्रिक्स से दो हाइड्रोजन ऑयन लेकर यूबीसेमीक्विनोन को अपघटित कर QH2 बनाता है। यह QH2 कॉम्प्लेक्स III से अलग हो जाता है। यूबीक्विनोन का यूबीक्विनोल के रूप में अपघटन माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली के अन्दर की तरफ होता है और यूबीक्विनोल का यूबीक्विनोन के रूप में ऑक्सीकरण बाहर की तरफ होता है, इसलिए मेट्रिक्स से हाइड्रोजन ऑयन (प्रोटोन) झिल्ली के बाहर पंप होते हैं और झिल्ली के बाहर प्रोटोन का अनुपात बढ़ता है।

साइटोक्रोम ऑक्सीडेज या कॉम्प्लेक्स IV

साइटोक्रोम सी ऑक्सीडेज या कॉम्प्लेक्स IV इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला का आखिरी प्रोटीन कॉम्प्लेक्स है। यह बहुत जटिल प्रोटीन है जिसमें 13 इकाइयाँ, दो हीम ग्रुप और धातुयुक्त उपघटक होते हैं जिनमें तांबे के तीन अणु, मेग्नीशियम का एक अणु तथा जिंक का एक अणु होता है।

यह एंजाइम कोशिकीय श्वसन के आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण क्रिया को उत्प्रेरित करता है और अंतिम इलेक्ट्रोन-अभिग्राहक (final electron acceptor) ऑक्सीजन (प्राणवायु) को इलेक्ट्रोन समर्पित करता है। ऑक्सीजन अपघटित होकर जल और ऊर्जा बनाती है। यह ऊर्जा मेट्रिक्स से प्रोटोन को झिल्ली के बाहर पंप करती हैं और झिल्ली के बाहर प्रोटोन का अनुपात (gradient) बढ़ता है। इस अतिम श्वसन क्रिया को निम्न समीकरण द्वारा व्यक्त करते हैं।

4Cyt cred + O2 + 2H+matrix à 4Cyt cox Q + 2H2O + 4H+intermembrane

ए.टी.पी सिन्थेज

ए.टी.पी. का निर्माण माइटोकॉंड्रियम की आंतरिक झिल्ली में स्थित ए.टी.पी.सिन्थेज मोटर एंजाइम द्वारा होता है। यह एंजाइम एक उत्कृष्ट मोटर की तरह कार्य करता है। लगभग 6000 चक्कर प्रति मिनट की गति से घूमने वाली यह मोटर सूक्ष्मीकरण की पराकाष्टा है। यह इतनी सूक्ष्म होती है कि एक पिनहैड जितनी जगह में दो लाख मोटरें समा जायें। हर कोशिका में ऐसी सैंकड़ों मोटरें होती हैं और हमारे शरीर में लगभग 10 क्वाड्रिलियन (यानी इसे लिखने के लिए आपको एक के आगे 16 शून्य लगाने होंगे) मोटरें होती हैं।

ए.टी.पी.सिन्थेज मोटर एंजाइम की संरचना अत्यंत जटिल होती है। यह आकार में काफी बड़ी और 31 तरह के प्रोटीन्स (जो 3000 अमाइनो एसिड्स की मदद से तैयार होते हैं) से बनी होती है। माइटोकॉंड्रियम की आंतरिक झिल्ली में स्थित इसका घूमने वाला चक्का सी-प्रोटीन उप-इकाई से बना होता है। इस चक्के से एक मुड़ी हुई धुरी जुड़ी होती है, जो चक्के के साथ घूमती है। यह गामा प्रोटीन उप-इकाई से बनी होती है। धुरी के दूसरा सिरा छः प्रोटीन उप-इकाइयों, 3 अल्फा और 3 बीटा से बनी एक टोपी में धँसा रहता है। यह टोपी घूमती नहीं है, बल्कि झिल्ली में स्थिर रहती है।

ए.डी.पी. का अणु (जिसमें दो फोस्फेट होते हैं) एक फोस्फेट के मिल कर ऊर्जावान ए.टी.पी. बनाता है। माइटोकॉंड्रियम की आंतरिक झिल्ली में इलेक्ट्रोन परिवहन श्रंखला द्वारा पैदा हुई ऊर्जा के प्रभाव से हाइड्रोजन ऑयन मेट्रिक्स से बाहर भेज दिये जाते हैं। धीरे-धीरे बाहरी अन्तर झिल्लीय कक्ष में हाइड्रोजन ऑयन की संख्या बढ़ती जाती है, जिसके फलस्वरूप मेट्रिक्स की तुलना में बाहरी कक्ष का पीएच कम होने लगता है अर्थात अम्लता बढ़ने लगती है और हाइड्रोजन ऑयन में घनात्मक आवेश होने के कारण बाहरी कक्ष अपेक्षाकृत अधिक घनात्मक होने लगता है। बाहरी कक्ष में बढ़ते विद्युत और रसाकर्षण के दबाव और अम्लता से छटपटाते हाइड्रोजन ऑयन पुनः मेट्रिक्स में जाना चाहते हैं। लेकिन वहाँ पहुँचने के लिए एक ही मार्ग बचता है जो ए.टी.पी.सिन्थेज मोटर एंजाइम से होकर गुजरता है। यह एंजाइम हाइड्रोजन ऑयन के सामने शर्त रखता है कि वे उसकी मोटर के चक्के को तेजी से घुमाकर ही मेट्रिक्स में प्रवेश कर सकते हैं। लाचार हाइड्रोजन ऑयन हर शर्त मानने को तैयार हो जाते हैं और मोटर के चक्के को तेजी से टर्बाइन की भाँति घुमाते हुए मेट्रिक्स में लौटने लगते हैं।

मोटर के साथ उसकी मुड़ी हुई धुरी भी टोपी में धुरी की तरह घूमती है जो अपनी याँत्रिक ऊर्जा से ए.डी.पी. और फोस्फेट से जोड़ कर ए.टी.पी. बना कर बाहर फैंकती जाती है। इस तरह एक ए.टी.पी.सिन्थेज एक चक्कर में लगभग तीन ए.टी.पी., एक मिनट में 18000, एक घंटे में दस लाख और एक दिन में ढ़ाई करोड़ से ज्यादा ए.टी.पी. बनाता है। यह मोटर विश्राम की अवस्था में कम और परिश्रम की अवस्था में अधिक ए.टी.पी. बनाती है। शरीर में यदि ऊर्जा (ए.टी.पी.) की मांग बढ़ती है तो यह हाइड्रोजन ऑयन के प्रवाह को तेज कर अपनी घूमने की गति बढ़ा लेती है और ए.टी.पी. का निर्माण भी बढ़ जाता है। यही है प्रकृति की सबसे अनूठी, सबसे जटिल और सबसे सूक्ष्म मोटर जिसके बिना हमारी सारी जीवन क्रियाएँ संभव ही नहीं हैं। ये जीवन की मोटर मनुष्य ही नहीं बल्कि सभी जन्तुओं और वनस्पतियों की कोशिकाओं में सर्वत्र विद्यमान हैं। इस Motor of Life की खोज, कार्य-प्रणाली का अध्ययन और चित्रण प्रोफेसर पॉल बॉयर (USA) और डॉ. जॉन वॉकर (UK) ने किया था जिनको इसके लिए सन् 1997 में नोबेल पुरस्कार मिला था।

Overall glucose tally sheet

Glycolysis

Output Total

2 ATP in 4 ATP ------> 2 ATP

2 NADH ------> 6 ATP

Krebs Acid Cycle

8 NADH

2 FADH2

2 ATP ------> 2 ATP

Electron Transport Chain + ATP synthetase

3 X 8 NADH ------> 24 ATP

2 X 2 FADH2 -----> 4 ATP

TOTAL

36 or 38 ATPs per Glucose


Wednesday, January 12, 2011

छिछोरेपन का 'न्यूटन' लॉ...खुशदीप

Posted on Tuesday, January 19, 2010by खुशदीप सहगलin Labels: कॉलेज, खुशदीप, छिछोरापन, न्यूटन, व्यंग्य

आप अगर साइंस या फिजिक्स के छात्र रहे हैं तो न्यूटन द ग्रेट के बारे में ज़रूर जानते होंगे...वहीं जनाब जिन्होंने गति (मोशन) के नियम बनाए थे...लेकिन ये बात फिजिक्स पढ़ने वाले छात्रों की है...कुछ हमारे जैसे छात्र भी होते थे जो क्लास में बैठना शान के खिलाफ समझते थे...गलती से कभी-कभार खुद ही पढ़ लेते थे तो पता चलता था कि प्रोटॉन हो या न्यूट्रान या फिर इलैक्ट्रॉन सब का एटम (परमाणु) में स्थान निर्धारित होता है...प्रोटॉन और न्यूट्रान तो न्यूक्लियस में ही विराजते हैं...इलैक्ट्रॉन बाहर कक्षाओं में स्पाईडरमैन की तरह टंगे रहते हैं...लेकिन कुछ हमारे जैसे फ्री इलैक्ट्रॉन भी होते हैं जो न तो न्यूक्लियस में बंधे रहना पसंद करते थे और न ही किसी कक्षा में लटकना...सौंदर्यबोध को प्राप्त करने के लिए कॉलेज के बाहर ही सदैव चलायमान रहते थे...

इलेक्ट्रोन का चुम्बकीय क्षेत्र बहुत गतिशील फोटोन को अपनी ओर आकर्षित करता है, प्रेम करता है... जब भी कोई विद्युत आवेश गतिशील होता है तो एक चुम्बकीय क्षेत्र बनता है...गतिशील फोटोन का भी चुम्बकीय क्षेत्र होता है... जब इलेक्ट्रान और फोटोन दोनों के चुम्बकीय क्षेत्र समान आवृत्ति पर गुंजन करते हैं तो तो गूटर-गूं, गूटर-गूं होना निश्चित है...

अब पास ही गर्ल्स डिग्री कॉलेज में इतराते-बल खाते फोटोनों (या फोटोनियों) का गुरुत्वाकर्षण चुंबक की तरह हमें खींचे रखता तो हम क्या करते...ये तो उन बुजुर्गों का कसूर था जिन्होंने दोनों डिग्री कालेजों को साथ ही बसा दिया था...बस बीच में लक्ष्मण रेखा की तरह एक दीवार बना दी...अब आग और घी इतना साथ रहेंगे तो कयामत तो आएगी ही...अरे ये क्या मैं तो पिछले जन्म के क्या इसी जन्म के राज़ खोलने लगा...भाई पत्नीश्री भी कभी-कभार हमारे ब्लॉग को पढ़ लेती है... मुझे घर में रहने देना है या नहीं...


खैर छोडि़ए इसे अब आता हूं न्यूटन जी का नाम लेकर कॉलेज में बनाए हुए हमारे छिछोरेपन के नियम से...
न्यूटन द ग्रेट

"हर छिछोरा तब तक छिछोरापन करता रहता है...जब तक कि सुंदर बाला की तरफ़ से 9.8 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से नुकीली हील वाला सैंडल उसकी तरफ नहीं आता...ये फोर्स (बल) बेइज्ज़ती

कहलाता है...और ये बल शर्मिंदगी के समानुपाती (डायरेक्टली प्रपोशनल) होता है...अगर छिछोरापन फिर भी कायम (कॉन्स्टेंट) रहता है तो बेइज्ज़ती की ये प्रक्रिया अनंत ( इंफिंटी) को प्राप्त होते हुए अजर-अमर हो जाती है..."

और इस तरह हम भी अमरत्व को प्राप्त हुए...


Monday, December 20, 2010

हिन्दी निमोनिक्स


निमोनिक्स ( “NE-mon’-आईसीएस”) स्पष्ट कृत्रिम उपादान की एक प्रणाली का उपयोग कर स्मृति की सहायता करने की कला है । नियमों, वाक्यांशों, चित्र, acronyms और अन्य विधियों की सहायता से नाम, तिथि , तथ्य और आंकड़े. आदि को याद रखने में मदद करता है। mnemonics लोगों को जानकारी प्राप्त करने के लिए एक त्वरित-संदर्भ स्रोत या विशिष्ट विषयों के साथ मदद, और किसी के लिए सहायता का एक पुस्तकालय (शिक्षकों को विशेष रूप से) है। सामान्य में mnemonics के बारे में जानकारी प्राप्त करने इस विषय इसके उपयोग और प्रयोजन विस्तृतीकरण के लिए एक विस्तृत विवरण शामिल करने का प्रयत्न है। यह निमोनिक्स का संक्षेप सार है, वृहद संस्करण मेमोरी गुरु द्वारा रचित “भूलना भूल जाओगे (Forget Forgetting)” के नाम से अलग से उपलब्ध है। जिस निमोनिक्स में मेमोरी गुरू रचित लिखा है वह दि मेमोरी गुरु आफ़ इन्डिया-The Memory Guru of India, N L Shraman. nlshraman@yahoo.co.in, http://unlimitedmemory.tripod.com/
(प्रो एन एल श्रमण) की मूल रचना है।
“स्मरण शक्ति असीमित और अपार है, सजीव करो या खो डालो।
आइंसटीन ने थोड़ा प्रयोग किया, थोड़ा तुम प्रयोग करो या धो डालो॥”
मेमोरी गुरू
गुरुर्शिक्षक: गुरुर्प्रशिक्षक: गुरुर्मार्गे दर्शिता:।
गुरु ज्ञानम अन्वेषक:गुरु उत्प्रेरक परामर्शित:॥
स्मरण शक्ति तकनीकें
चित्रं विचित्रं संक्षेप सारम्। काव्यं कथां गुरू:सूत्रौ आहारम्।।
मिथ्यांक संधि व्यायामम्। योगेन्द्रि च विद्या व्याख्यानम्
क्षैतिज में चक्षु गति अरु गुलाब की गंध। निद्रा पूर्व अध्ययन करें दृटा हो या अंध।।
जल आक्सीजन विटामिन ई । संतुलित भोजन निद्रा जी ॥
-मेमोरी गुरु रचित
स्मरण की प्राचीन विधियॉ
यात्रा कक्ष शरीर विधि, वस्तु करो सम्बद्ध्।
द्वार द्वार स्थानक रखो, स्मरण श्रेणी बद्ध ॥ -मेमोरी गुरु रचित
स्मरण शक्ति के प्रकार
सुनना देखना बोलना, कर भावुकता की बात ।
हाथ से कर के सीख ले जीवन की सौगात ॥-मेमोरी गुरु रचित
दायाँ बांयाँ (सीधा, उल्टा) मस्तिष्क का अंतर
तर्क वस्तुगत उल्टा, गणित तथ्य विज्ञान।
धर्म विश्वास साहस सीधा यादृच्छिक अंतर्ज्ञान ॥
न्यूरोबिक्स
उलटा हाथ उलटी चाल, आखें बंद कर करो कमाल ।
सब कुछ उलटा पुल्टा बदलो न्यूरोबिक्स की यही मिसाल ॥ -मेमोरी गुरु
लम्बे पाठ को याद करने की विधि
लम्बा पाठ हो कैसे याद।
हाथी खाओ टुकड़े काट॥
(पाठ को विभाजित करके याद करो) -मेमोरी गुरु रचित
स्मृति ह्रास को रोकना
अबिलम्ब रोको स्मृति ह्रास ।
जल्दी खींचो लम्बी साँस॥ -मेमोरी गुरु रचित
मीट्रिक पद्धति याद करना
डेका दस है किलो हजार । हेक्टो से समझो सौ बार ॥
दसम डेसी, सौंवां सेंटी । है हजारवां, भाग मिली ॥
बाडी मास सूचक (Body Mass Index-BMI) की गणना
शरीर किलो में तौल कर खा भाजी अरु साग ।
कर वर्ग ऊंचाई मीटर में औ देदे इससे भाग॥
BMI = Weight (kg) / Height² (m²)-मेमोरी गुरु रचित
धातुओं के परमाणु भार
चांदी सौ के ऊपर सात, लोहे की पचपन औकात।
सोना दोसौ से नीचे तीन,दोसौ पारा एकसौ उन्निस टीन ॥ -मेमोरी गुरु रचित
अम्ल व क्षार
अम्ल में लिटमस होता लाल, क्षार में होता नीला।
शोरे अम्ल में पड़े प्रोटीन, बन जाए रंग पीला ॥
आवर्त सारणी (Periodic Table) के बीस तत्व
हे! हेली बेबी कौन ओफ़ ने ना मागा ।
अलसी पीस कलेयर बीस तत्व के काका ॥
{1 H, 2 He, 3 Li,4 Be,5 B,6 C,7 N,8 O,9 F,10 Ne,11 Na,12 Mg,13
Al,14Si,15P,16S,17Cl,18Ar,19 K,20 Ca}-मेमोरी गुरु रचित
आवर्त सारणी के 21से 30 तक के तत्व
स्केन्डनेविया (Scandium) नगर मे समुद्र के किनारे टाईटेनिक (Titanium) जहाज खड़ा
था। उस पर वन्दना (Vanadium) नाम की लड़की थी जिसके चप्पल क्रोम (Chromium) चमड़े
के बने थे। बह मनगनेश (Manganese) मन्दिर में पूजा करने जाती है। मन्दिर के बाहर
लोहे (Iron) की जाली लगी है। तभी वहां एक कोबरा (Cobalt) सांप आता है जो निकिल
(Nickel) की तरह चमकता है। सांप मन्दिर में तांबे (Copper) के बर्तन में रखा पानी
पीकर उसमें सिंक ( Zink) कर जाता है। -मेमोरी गुरु
सेल्शियस व फ़ारेन्हाईट को आपस मे बदलना (C°,F°)
बत्तीस घटाकर फ़ारेन्हाईट से कर दो नौ से भाग ।
बराबर सेंटीग्रेड के यदि बांटो भाग में पांच ॥
या
फ़ारेन्हाईट से बत्तीस घटाक,दस से गुणा अठारह से भाग॥
( C/5) = (F-32) /9 -मेमोरी गुरु रचित
अनुमान लगाकर सेल्शियस व फ़ारेन्हाईट को आपस मे बदलना (C°,F°)
फ़ारेन्हाईट से घटा तीस, दो टुकड़े कर एक खींच ॥ उदा0 98 फा0=(98-30)/2=34 सेल्शियस
लगभग –मेमोरी गुरु
किलो को पौंड में बदलना
किलो को कर दूना लिख ले गुरु का सार । सार सार का दसवां जोड़ बने पौंड का भार ॥
उ. 8कि=16+1.6=17.6पौंड -मेमोरी गुरू
रेज़िस्टैंस( प्रतिरोध-Resistance)
रेज़िस्टैंन्स होता है क्या ? वी (V) उल्टाकर नीचे ला॥
Resistance=V/A -मेमोरी गुरु रचित
सेमी को इंच में व इंच को सेमी में बदलना
चार से गुणा दस से भाग, सेंटीमीटर को इंच में नाप ।
दूना फिर इसका आधा, इंच को सेंटीमीटर में नापा ॥ -मेमोरी गुरु रचित
कलर कोड
बीबी रोये गबलू विगरे।
ब्लैक,ब्राउन,रेड,येलो,ग्रीन,ब्ल्यू,वायलेट,ग्रे,(व्हाइट)-मेमोरी गुरू
वाट (Watt) की गणना करना
बिजली का बिल कितना भरो । वोल्ट एम्पियर गुणा करो ॥
( Watts = Volt x Ampere)
-मेमोरी गुरु रचित
“रुपया” मुद्रा के देश व भारत के पड़ोसी देशों की मुद्राएं
भारत लंका पकिस्तान, सीचल मारीशस नेपाल ।
मुद्रा रुपये का टकसाल, टाका बंगला नू भूटान ॥ -मेमोरी गुरु रचित
प्रकाश के सात रंग, वर्णक्रमानुसार
बैआनीहपीनाला (बैगनी, आसमानी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल) -मेमोरी गुरु रचित
विश्व के महाद्वीप याद करना
आना एशिया ( ANA ASEA)
A= एशिया, N= नार्थ अमेरिका, A= आस्ट्रेलिया, A= अन्टार्कटिका, S= साउथ अमेरिका, E=
यूरोप, A= अफ़्रिका
-मेमोरी गुरु रचित
विश्व महासागरों को याद करना
पियासा (PIASA) : P=पैसिफ़िक, I= इन्डियन, A=अट्लांटिक, S=सदर्न, A=आर्क्टिक
महासागर
-मेमोरी गुरु रचित
“यूरो” (EURO) करेन्सी प्रयोग करने वाले देश
ऐसा बेल गिरा फ़िर फ़िन जर । पोर सपा निद लक्स इटायर ॥
आस्ट्रिया, बेल्जियम, ग्रीस, फ़्रास, फ़िन्लैंड, जर्मनी,पुर्तगाल, स्पेन, नीदरलैंड,
लक्जमबर्ग, इटली, आयरलैंड-मेमोरी गुरु रचित
भारत के प्रदेश याद करना
उत्तर उत्तरा मध्य पश्चिमी, छत्तीस राजा झाड़ सिक्कमी,
मेघ नाग मणि मजे त्रिपुरारी, अंधड़ काना तमिल बिहारी,
कश पंजाबी गूजे महा कोला, आशा अरुण हरी हिम गोला्।
उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, मध्य प्रदेश, पश्चिमी बगाल, छत्तीस गढ़, राजस्थान,
झारखण्ड, सिक्किम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, आन्ध्र प्रदेश,
उड़ीसा, कर्णाटक, तमिलनाडु, बिहार, काश्मीर, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, आसाम
अरुणांचल, हरियाना, हिमाचल प्रदेश, गोला। -मेमोरी गुरु रचित
भारत के केन्द्र शासित प्रदेश याद करना
दिल्ली दमन दादरा अंडा। चंडी लक्ष्य सात ही पंडा ॥
दिल्ली, दमन दीव, दादरा व नगर हवेली, अंडमान निकोबार, चन्डीगढ़ व लक्ष्यद्वीप ।
-मेमोरी गुरु रचित
भारत के पिछड़े प्रदेश
बीमारू। बिहार,मप्र,राज,उप्र
उत्तर प्रदेश के पांच बड़े शहर
कवल सिटी( KAVAL). कानपुर,आगरा,वाराणसी,इलाहाबाद,लखनऊ
पंजाब की पाँच नदियों के नाम
रावी, सतलज, व्यास सरि, झेलम और चिनाब।।
इन पाँचो के बीच में बसे राज्य पंजाब ॥ -मेमोरी गुरु रचित
भारत की सबसे बड़ी पाँच नदियां
ब्रह्मा गंगा की गोद में । नर्मदा कृष्ना की खोज में ॥-मेमोरी गुरु रचित
सबसे बड़ा, छोटा, लम्बा, गहरा, ऊंचा, चौड़ा
जिराफ़ जानवर सबसे ऊंचा, चिड़िया आस्ट्रिच भारी। हमिंग बर्ड है नन्ही छोटी, चीता
तेज सवारी ॥
महाद्वीप है बड़ा एशिया, देश बड़ा है रशिया। स्वेज़ नहर है सबसे लम्बी, पेनीसुला
अरेबिया॥
जन संख्या में बड़ा चाईना, टोक्यो सबसे महंगा। रेगिस्तान सहारा का, बहती बन सुन्दर
गंगा॥
नील नदी की लम्बाई, बाल्कल झील की गहराई। झील सुपीरियर एकदम ताजी, नदी अमेज़न
चौड़ाई॥
एवरेस्ट की चोटी चोटी पर, मौसिनराम में बरसे पानी। सबसे छोटा देश वेटिकन, महाभारत
है बड़ी कहानी॥
ब्रिटिश म्यूजियम बड़ा अनोखा, ऊंचे से गिरता ऐंजिल फ़ाल। ट्रास- साईबेरियन रेल चली
है,खड़गपुर में उतरे माल ॥
-मेमोरी गुरू
भारत के राष्ट्रपति
राजे राधे जाकिर पति, बारह हिदायत बारह गिरि।
फ़िकिर बसपा नीलम जेल, रामा वेंकट नीलम मेल।
कलम में प्रतिभा देश गति, ये भारत के राष्ट्रपति।
-मेमोरी गुरु
भारत के प्रधान मंत्री
लाल जवाहर गुल खिलारे, लाल बहादुर इन्द्र जगारे॥
मुरारी के चरण राजीव रहें, विश्व चन्द्र नरसिंह भगारे ॥
अटल के गोड़ गुजरात गये, फ़िर अटल हुए मनमोहन प्यारे॥
जवाहर लाल नेहरू, गुलजारीलाल नंदा ,लालबहादुर शास्त्री ,गुलजारीलाल नंदा, इन्दिरा
गान्धी, मोरारजी देसाई ,चौधरी चरण सिंह,इन्दिरा गान्धी, राजीव गान्धी ,विश्वनाथ
प्रताप सिंह ,चंद्रशेखर नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी ,एच डी देवगौड़ा,इंद्रकुमार गुज़राल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह । -मेमोरी गुरु रचित
भारतीय संविधान में 6 मौलिक अधिकार
समता, स्वतंत्रता संवैधानिक उपचार। धर्म संस्कृति शिक्षा रक्षा, शोषण के विरुद्ध
हों तैयार॥-मेमोरी गुरु रचित
भारत का राष्ट्रध्वज
ऊपर केशरिया नीचे हरियाली। मध्य चक्र में चौबीस तीली॥ -मेमोरी गुरू
भारत के गीत
बन्दे बंकिम जन गण टैगोर। सारे जहां इकबाल लाहौर ॥
आमार सोनार रविन्द्र नाथ । जब बांगलादेश ने छोड़ा साथ ॥
-मेमोरी गुरू
भारत के शौर्य पुरस्कार
कीर्ती शौर्य बीर महान। अशोक परमबीर सन्मान॥ -मेमोरी गुरू
भारत खेल पुरस्कार
अर्जुन द्रोणाचार्य के जहां चलेंगे तीर ।
राजीव गांधी के खेल में ध्यानचन्द ही बीर ॥ -मेमोरी गुरू
राष्ट्रीय धरोहर
वन्दे जनगण कुमुद शक बट मंडल व व्याघ्र।
आम्र अशोक हाकी मयूर यही राष्ट्र के ताज ॥
( वन्दे मातरम्, जन गण मन, कमल, शक सम्बत्, बरगद,सोनेट मंडल, बाघ, आम,अशोक,हाकी,
मोर, ताज) -मेमोरी गुरु
पानीपत के तीन युद्ध
पानीपत की तीन लड़ाई। पन्दर छ्ब्बीस, छप्पन, सतरह एक्सठ भाई ॥ -मेमोरी गुरु रचित
सौर मंडल क्रमानुसार
मेरी वीना इंगलैंड मेड। जानी सिट अंडर नाइन प्लैनेट॥ -मेमोरी गुरु रचित
चतुष्कोण
आनैवाई = आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान
पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी
सहस्त्र चौरासी जोड़ लो तीन लाख की गिनती ।
हम पर आना छोड़ दो करे चन्द्रमा विनती॥
(3,84,000 किमी) -मेमोरी गुरु
पृथ्वी से सूर्य की दूरी
पन्द्रह करोड़ सूरज की दूरी । ड्योढ़ा मंगल वृहस्पति पसेरी ॥
बुध शुक्र है आधे पौने । यूरेनस बीस शनि दसहरी ॥
(सूरज =150000000 किमी, मंगल इससे 1.5, वृहस्पति 5 , बुध 0.39, शुक्र 0.72 व शनि
9.54 गुना दूर है) –मेमोरी गुरु
पृथ्वी की परिधि व चाल
चौबीस घंटे, चौबीस हजार, एक देशान्तर चौथाई वार।
(24,000 मील, 24घंटे का चक्कर, 1/4घंटे मे एक देशान्तर) –मेमोरी गुरु
ध्वनि व प्रकश की गति (किमी)
घड़ी में दर्जन सौ आवाज। पल में तीन लाख प्रकाश ॥ (1200/घ, 300,000/से किमी)
फल व वृक्षों के नाम याद करना
पीपल बरगद नीम बबूल, गूलर चन्दन बांस खज़ूर ।
छुहारा किशमिश पिस्ता बादाम, आड़ू लीची जामुन आम ॥ -मेमोरी गुरु रचित
वर्गीकरण
केला पेड़ कली और फ़ूल जैसा।
Kingdom, Phylum, Class, Order, Family, Genus, Species
पक्षियों के नाम
बगुला बाज़ बतख बटेर, बुलबुल बया तोता तीतेर।
उल्लू सारस मैना गौरैया,खन्जन हंस कबूतर कौवा॥ -मेमोरी गुरु रचित
स्मृति वर्धक जड़ी बूटी
मण्डुकपर्ण्याः स्वरसः क्षीरेण यष्टीमधुकस्य चूर्णम्‌ । रसो गुडुच्यास्तु
समूलपुष्प्याः कल्कः प्रयोज्यः खलु शंखपुष्प्याः । मेध्यानि चैतानि रसायनानि मेध्या
विशेषेण च शंखपुष्पी ।।
भारत की रबी व खरीफ़ की फसलें
ज्वार बाजरा उड़द धान, मक्का मूंग तिल क्वारी जान ।
सरसों तीसी मटर चना, गेहूँ जौं रबी में गिनना ॥ -मेमोरी गुरु रचित
भारत की ॠतुएं एवं महीने
वसंत्श्चैत्र वैशाखौं ज्येष्ठाआषाढ़ो च ग्रीष्मकौ ।
वर्षा श्रावण भाद्राभ्याँ शरद आश्विनकार्तिकौं ।
मार्गपौंषौ च हेमंतः शिशिरौं माघ फाल्गुनों। ।
मिट्टियों के नाम
रेत, भूड़रा, दोमट, पोता, चिकनोंट, गाढ़, टैर, कसेटा । मटियार, कठार, मकसीला, पूठा,
बाँगर, कल्लप, कबिसा ॥ऊसर, बंजर, चिकपीरा, कुम्हरौटी, रेह, ककरेठा ॥ -मेमोरी गुरु
रचित
कभी भूलें नहीं
चाभी चश्मा कलम रूमाल । पर्स में कंघा करे कमाल ।। छाता छ्ड़ी हेल्मेट घड़ी ।
मोबाइल देखो घड़ी घड़ी ॥ -मेमोरी गुरु रचित
विद्यार्थियों के लिये
बैग बाक्स बोतल रखो ड्रेस को रखो तहाय । टाईम टेबल भूलो नहीं जूतों को चमकाय ॥
टिफिन छोड़ आना नहीं साप्ताहिक दिन जानि। अगर परीक्षा हो कभी मेमोरी गुरू की मानि ॥
-मेमोरी गुरु रचित
स्कूल बस्ते का भार
छात्र के भार का दस फ़ी सदी, ज्यादा हो तो हड्डी टूटी ॥
घन्टा व मिनट का योग करना
घन्टा मिनट इकट्ठा लिख, गिनती जैसा जोड़ना सीख । इसमें चालिस दे तू जोड़, उत्तर
घन्टा मिनट में फोड़॥
उदा- 1 घं 35मि + 3घ 55मि =135+355=490+40=530 5घ 30मि (जब मि का योग>१घं)
–मेमोरी रु
दो संख्याओं का गुणा (समान दहाई व इकाई का योग 10)
योग इकाई हो एक दहाई, एक समान हो गिनती बायीं ।
एक दहाई में जोड़ो एक, गुणा करो और दे दो फेंक ॥ -मेमोरी गुरु
ठोस ज्यामिति के आयतन (घन) के सूत्र
“पाई” त्रिज्या वर्ग ऊँचाई । बेलन पूरा शंकु तिहाई ॥
लम्बाई चौड़ाई और ऊँचाई । आयत पूरा पिरामिड तिहाई ॥
“पाई और त्रिज्या का घन । चार तिहाई गोले का धन ॥ -मेमोरी गुरु रचित
ठोस ज्यामिति के क्षेत्रफल
आबा आसा बासा योग कर दूना । आयताकार ठोस का बने बिछौना ॥ [( 2(ab+ac+bc)]
चार पाई त्रिज्या का वर्ग । मापो हर गोले का भूगर्भ ॥ (4 π r² )
त्रिज्या ऊँचाई व त्रिज्या वर्ग का योग । गुणा कर दूनी पाई से बने क्षेत्र संयोग ॥
[2 π ( r h + r²)] -मेमोरी गुरु
पाई त्रिज्या शन्कु ऊँचाई । जोड़ो त्रिज्या वर्ग गुण पाई ॥ (π r² +π rl)
त्रिभुज का क्षेत्रफल
जोड़ भुजाएँ कीजै आधा । ‘फल’ को रक्खो मन में साधा ॥
हर भुजा का ‘फल’ से अंतर । आपस में गुणा पाएँ ‘उत्तर’ ॥
‘उत्तर’ का अंत में ‘फल’से गुणा । वर्गमूल से क्षेत्रफल जुड़ा ॥
फल (s) = (a + b + c) / 2 क्षे = वमू(s * (s – a) * (s – b) * (s – c))
-मेमोरी गुरु रचित
किसी संख्या का वर्गमूल
अनुमान लगाकर ‘संख्या’ करो विभाजित, छोड़ो आधा पाधा।
भागफल व संख्या का जोड़ विभाजित कर दो आधा आधा ॥ -मेमोरी गुरु रचित
पाईथागोरस प्रमेय
लम्ब वर्ग आधार वर्ग,इन दोनो का योग । कर्ण वर्ग समान है, अद्भुत गुरु संयोग ॥
-मेमोरी गुरु रचित
प्रतिशत का आसान तरीका
“अ” का “ब” प्रतिशत व “ब” का “अ” ।
दोनों का उत्तर होगा एक ही “स” ॥ -मेमोरी गुरु रचित
मिश्रधन ब्याज की गणना
दर प्रतिशत में एक जोड़कर लगा समय की घात।
गुणा मूल से गुरू कर, मिले मिश्रधन ब्याज ॥ -मेमोरी गुरु रचित
साधारण ब्याज की गणना
समय मूल दर प्रतिशत का गुणा।
इतना ही ब्याज साहूकार को मिला॥ -मेमोरी गुरू
गति दूरी व समय
दूरी को समय से भाग दे गुरु गति पावे ।
गति समय का गुणा शीघ्र दूरी आ जावे॥ -मेमोरी गुरू
भिन्न से भाग देना
जिस भिन्न से देना भाग। गुणा करो उल्टा लटकाक ॥ उदाहरण: 4 / (½) = 4 * (2/1) = 8
-मेमोरी गुरु रचित
बीजीय गणना
ब्रेकेट, ‘का’ को पहले साफ़, गुणा करो फ़िर दीजे भाग ।
जोड़ घटाना अंत में ,हल करने से पहले जाओ जाग ॥ -मेमोरी गुरु रचित
द्विपदीय संख्याओं (Binomial) का ग़ुणा
पहला, बाहरी, अंदर, आखिरी॥ (अ+ब) (स+द) =अस+अद+बस+बद -मेमोरी गुरु रचित
बैंक में कितने वर्ष में दूनी राशि
दुगुना रुपया बैंक में हमें बताए कोई ।
भाग बहत्तर ब्याज से, बर्षों में दूनी होई ॥
उदाहरण: 12 प्रतिशत ब्याज की दर से 72/12 यानी छ: वर्षों में दूना होगा। -मेमोरी
गुरु रचित
मील को किलोमीटर मे बदलना
फिबोनैकी के नोट करो नंबर।
बायां मील दायां किलोमीटर ॥
फिबोनैकी नंबर: 1, 2, 3, 5, 8, 13, 21, 34, 55, 89 आदि। उदाहरण: 3मील= 5किमी,
5मील=8किमी, 13मील=21किमी
(किलोमीटर होता कितना बड़ा। आठ से भाग तीन से गुणा॥)
-मेमोरी गुरु रचित
कमरे की दीवारों का क्षेत्रफल
लम्बाई चौड़ाई जोड़कर दूना। गुणा ऊँचाई आये हर कोना ॥ -मेमोरी गुरु रचित
लीवर के प्रकार
प्रथम, द्वितीय ,तृतीय श्रेणी, लीवर तीन प्रकार।
आलम्ब,बोझ,शक्ति, ‘अ’ ‘ब’ ‘स’ मध्य में क्रमवार ॥ -मेमोरी गुरु रचित
यातायात दीपक
सबसे ऊपर लाल लाल बीच में होती पीली। सबसे नीचे हरी देखकर पापा की गाड़ी चल दी॥
-मेमोरी गुरू
अंग्रेजी वर्तनी
एशैसिनेशन= हत्या। एक गधा ( ASS ) उसके पीछे एक और गधा (ASS ) उसके पीछे मैं (I)
मेरे पीछे सारा देश ( NATION ). ASS+ASS+I+NATION= Assassination , शैम्पेन=
शराब।
चम्पा (CHAMPA ) जी (G ) ने ( NE ), CHAMPA+G+NE=CHAMPAGNE.-मेमोरी
गुरु रचित
अँगरेज़ी कुन्जी पटल
The quick brown fox jumps over the lazy dog
अँगरेज़ी कुन्जी पटल (Computer Keyboard) की पहली पंक्ति
टिल्डी एक्यूट एक्सक्ले ऐट, नम्बर डालर पर्सेन्ट कैरेट ।
एमपर ऐस्ट्रिस्क पैरेन्थ डैस, इक्युवल प्लस बैक स्पेस ॥ -मेमोरी गुरु रचित
अँगरेज़ी कुन्जी पटल (Keyboard) का अक्षर क्रम
कुवेर टी तुम मैं वह पाये। असद फौजी हाजी को लाये।
जोक्स सीवी बनाम छोटा बड़ा। छब्बीस अक्षर का कीबोर्ड खड़ा॥ -मेमोरी गुरु रचित
कम्प्यूटर हार्डवेयर
सीपीयू की बोर्ड प्रिन्टर सांचा मोडेम मूस मानीटर ।
कार्ड कैमरा स्पीकर ड्राइव, सब कम्प्यूटर के हार्डवेयर॥ -मेमोरी गुरु रचित
कम्प्यूटर हार्डवेयर की भंडारण क्षमता
बाइट बिट का आठ गुना। केबी एमबी कैसे बना॥
गीगा टेरा क्या है होता। कितने बिट का बनता पेटा॥
दो का आधार आठ की घात। एक किलो की इतनी बात॥
आठ की घात बढ़ाते जाओ। आधार को स्थिर रखते जाओ॥
दशमलव में दस आधार । तीन की घात बढ़ा हर बार॥
यही गुरू की भंडारण क्षमता। हजार गुना से नाम बदलता॥ -मेमोरी गुरु रचित
विश्व प्रसिद्ध कम्प्यूटर आपरेटिंग सिस्टम
लाइनक्स मैक विन्डो जेनिक्स, सिस्टम डास रेडहैट यूनिक्स्॥ -मेमोरी गुरु रचित
विश्व प्रसिद्ध इन्टरनेट ब्राउजर
क्रोम कमीनो इन्टरनेट एक्स्प्लोरर, अवंत ओपेरा नैवीगेटर।
अमाया फ्लोक्स, सीमंकी मैक्सथान, स्लिम कन्करर कैमेलान ॥ -मेमोरी गुरु रचित
विश्व प्रसिद्ध ई-मेल (E-mail Client)
आउटलुक, इयूडोरा, थन्डरबर्ड, डेल पीजस लेलो हाट। वेब पर रीडिफ़, याहू जी गलत जो
भेजा पड़ेगी डांट॥ -मेमोरी गुरु रचित
विश्व प्रसिद्ध आफ़िस साफटवेयर
ओपेन आफ़िस माइक्रोसाफ्ट, लोटस कोरल हर दम साथ। अबीवर्ड को घर में लाओ। बज़वर्ड
गूगल ओनलाइन पाओ ॥ -मेमोरी गुरु रचित
विश्व प्रसिद्ध अंटी वायरस(Anti virus)
ऐवीजी अवास्ट अवीरा, हरे हर कमप्यूटर की पीड़ा।
नार्टन मैकैफ़ी पीसी टूल, कैस्पर फायर जाओ भूल॥ -मेमोरी गुरु रचित
विंडो के मेनू बार व फाईल मेनू
मेनू बार फूफट (FEVFTH): File, Edit,View, Favorite, Tool and Help
फाईल के मेनू
नया पुराना खोलो बंद, बदल सहे्जो नाम।
सेट अप सहेजो छापो लेटर, शुरू यहां से काम ॥
आयात और निर्यात यहीं से भेजो जितनी दूरी।
गुण अवगुण सब देख चुके तो फाईल नहीं अधूरी॥ -मेमोरी गुरू
किसी संख्या को द्विआधारीय (Binary) संख्या में बदलना
संख्या को दो से भाग करो, फल को दो से भाग निरन्तर।
शून्य शेषफल “शून्य” लिखो, अथवा “एक” यही है अंतर॥
लिखो दाएं से पहला उत्तर क्रम से लिखो शून्य या एक।
सबसे बाएं शून्य हो केवल हटा तुरत क्या रहे हो देख ॥
-मेमोरी गुरू
पाई(π) का मान 50 अंकों तक
3.141592653 5897 932384 6264338327 9502884197 1693993751 मिथ्या अंक शास्त्र
द्वारा: 1=त,थ,द,ध 2=न 3=म 4=र 5=ल 6=च, छ, ज 7=क 8=व, ह 9=प फ, ब, भ, मथुरा ताल
बना चलो मिलें है पक्का 3.141592653 5897 बामन में है राजन चोर मामा है मनका 932384
6264338327 पल सा नहीं हारता बक ताजा पी मैं भी बमका लौटा 9502884197 1693993751
इसी विधि से भारत के प्रधान मंत्री का दूरभाष: नमसते नाम अटन- २३०१ २३ १२ -मेमोरी
गुरु रचित
कारक व विभक्तियों को याद करना (हिन्दी, संस्कृत व्याकरण)
कर्ता “ने” को कभी न भुलो । सदा कर्म “को” ठीक समझ लो ॥
करण “से” मिलती सदा भलाई । सम्प्रदान “के लिए” भलाई॥
अपादान “से” जाये गरूर । “का, की, के ” सम्बंध सकूर ॥
“में,पे,पर” अधिकरण सुहाय । सम्बोधन “हे, अरे” भुलाय ॥ -मेमोरी गुरु रचित
समास
द्वन्द्वो द्विगुरपि चाहं मद्गेहे नित्यमव्ययीभावः। तत् पुरुष कर्म धारय येनाहं
स्यां बहुव्रीहिः॥
छंद के गण
“यमाताराजभानसलगा” मात्राओं और वर्णों की संख्या और क्रम की सुविधा के लिये तीन
वर्णों के समूह को एक गण मान लिया जाता है। गणों की संख्या ८ है – यगण (।ऽऽ), मगण
(ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।) और सगण (।।ऽ)।
छंदों के कुछ प्रकार
“कूदो चौरासी” कुन्डली, दोहा, चौपाई, रोला,सोरठा
तुलसी दास का निर्वाण
संबत सोला सौ असी असी घाट के तीर। श्रावण शुक्ला तीज शनि तुलसी तज्यो शरीर ॥
इतिहास की तारीखें
हिरोशिमा (जापान) पर परमाणु बम कब गिरा था ? हिरोशिमा (4 अक्षर), बम जापान (5
अक्षर)= 45 (1945)-मेमोरी गुरु रचित

Friday, November 26, 2010

नेहरू-एडविना : परिपक्व प्रेम की मिसाल

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंड़ित जवाहरलाल नेहरू और उनके जीवन से जुडे कई प्रसंगों को तो हम जानते हैं लेकिन उनके और एडविना माउंटबैटेन के बीच रिश्ते् के बारे में आज भी बहुत कम लोग जानते हैं। दोनों के बीच एक ऐसा गहरा रिश्ता था जिसे शब्दों से नहीं, सिर्फ भावनाओं से ही समझा जा सकता है। जहां पं. नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे, वहीं एडविना ब्रिटिश उपनिवेश के आखिरी वायसराय व स्वाधीन भारत के पहले गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबैटेन की पत्नी थीं। पं. नेहरू और एडविना की मित्रता या प्रेम को दुनियाभार के लोगों ने भले ही अपने-अपने नजरिए से देखा और परिभाषित किया हो, मगर इन दोनों के अपने ही सबसे करीबी रिश्तेदारों ने इनकी इस मित्रता को आत्मिक व परिपक्व प्रेम का नाम दिया है। एडविना के पति माउंटबैटेन, जिन्हें भली-भांति पता था कि उनकी पत्नी नेहरू जी से प्रेम करती है, इस बात पर फक्र महसूस करते थे कि एडविना ने विश्व के एक महान व्यक्ति को अपना प्रेमी चुना है।

माउंटबैटेन की पुत्री पामेला माउंटबैटेन एक जगह लिखती हैं, ''मेरी मां के पहले भी कई प्रेमी थे, इस बात ने मेरे पिता के हृदय को आघात पहुंचाया था, लेकिन नेहरू के मामले में यह बात किसी तरह से अलग थी। नेहरू के प्रति उनका खास लगाव था।" पामेला जून, 1948 में अपनी बड़ी बहन को लिखे माउंटबैटेन के पत्र का हवाला भी देती हैं। जिसमें वे लिखते हैं, ''वह (एडविना) और नेहरू एक-दूसरे के साथ बहुत प्रसन्न रहते हैं तथा वास्तव में सबसे अच्छे तरीके से एक-दूसरे को प्यार करते हैं।"

दूसरी ओर, नेहरू जी की बहन विजयलक्ष्मी पंड़ित ने माना था कि ''वह समय बहुत कठिन था। मेरे भाई एक महत्वपूर्ण काम कर रहे थे तथा ऐसे समय में उनकी पत्नी की मृत्यु हो जाने से वे पूर्णत: अकेले हो गए थे। उनके हृदय में एडविना माउंटबैटेन की बुद्धिमतापूर्ण संगति और उनके स्नेहिल व्यक्तित्व के प्रति प्रेम उत्पन्न हो गया। वे दोनों सदैव एक-दूसरे से बहुत विवेकपूर्ण चर्चाएं करते थे।" इसी प्रकार नेहरू जी की सुपुत्री इंदिरा गांधी ने लिखा है, ''मेरे पिता जिस प्रकार का जीवन व्यतीत करते थे, उस स्थिति में एक भिन्न प्रकार के व्यक्ति के साथ स्नेह-संबंध उनके तनावों को ढीला करने के लिए बहुत आवश्यक था। वे दोनों गंभीर, बौद्धिक चर्चाएं करते थे और मेरे पिता एडविना को बहुत प्याथर करते थे।"

नेहरू, एडविना और माउंटबैटेन एक-दूसरे को पत्र लिखा करते थे। एडविना के पति लॉर्ड माउंटबैटेन नेहरू के इन पत्रों को 'प्रेम पत्र" की संज्ञा देते थे। इस बारे में उन्होंने स्वयं कहा था कि नेहरू जी मुझे तो टाइप किए हुए पत्र लिखते थे, लेकिन एडविना को वे हस्तलिखित पत्र लिखा करते थे। एडविना की मृत्यु के उपरांत भी उनके पति ने इन पत्रों को संभाल कर रखा था। माना जाता है कि इन तमाम पत्रों का वजन करीब 30 किलोग्राम था। इन पत्रों में फूलों की पंखुडियों भी होती थीं। जो पत्र एडविना ने पं. नेहरू को लिखे थे उनके बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिलती क्योंकि उनके बारे में नेहरू परिवार ने सार्वजनिक रूप में खुलासा नहीं किया।

एडविना सन् 1855 से 1865 की अवधि तक ब्रिटेन के प्रसिद्ध प्रधानमंत्री रहे लॉर्ड पामर्स्टन की वंशज थीं। एडविना की बालावस्था में ही उनकी मां की मृत्यु हो जाने के कारण वे मानसिक रूप से अंतर्मुखी तथा बहुत संवेदनशील हो गई थीं। शायद यही कारण था कि उनके हृदय में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति तभी से सहानुभूति व लगाव था जब सन् 1922 में उन्हें पहली बार भारत आने का अवसर मिला। यही वजह थी कि जब वे इंग्लैंड वापिस लौटीं और लॉर्ड माउंटबैटेन के साथ उनका विवाह हो गया, तब भी एडविना का लगाव भारत से बना रहा तथा वहां रहकर भी वे भारत, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और उसके नेताओं के बारे में सोचती, पढ़ती एवं उत्सुकता से जानने की कोशिश करती रहती थीं। सन् 1936 में जब पं. नेहरू की पत्नी कमला नेहरू का देहांत हुआ उसी वर्ष लंदन के 'बोडले हेड" ने पं. नेहरू की आत्मकथा का प्रकाशन किया। जिसके संपादक थे वी। के। कृष्णमेनन। कृष्णमेनन एडविना और नेहरू दोनों के ही मित्र थे। एडविना की रूचि देखते हुए इन्होंने ही उन्हें यह पुस्तक पढ़ने को दी थी। नेहरू जी की आत्मकथा का अध्ययन करने के बाद एडविना की उनसे मिलने की इच्छा और बलवती हो गई थी।

विवाह के बाद एडविना को सन् 1945 में अपने पति माउंटबैटेन के साथ पुन: भारत आने का मौका मिला। इस मौके का फायदा उठाते हुए उन्होंने अहमदनगर किले में कैद पं. नेहरू से मिलने का प्रयास किया, परन्तु अंग्रेजी हुकूमत से उन्हें इस बात की अनुमति नहीं मिल सकी। उनकी यह इच्छा आगामी वर्ष में ही पूरी हो पायी जब मार्च, 1946 में माउंटबैटेन दंपति तथा पं. नेहरू सिंगापुर में थे। इसी दौरान एडविना और पं. नेहरू की प्रथम मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात ने जल्दी ही इन दोनों के बीच एक गहरी दोस्ती और प्रेम की नींव रख दी थी।

इस संदर्भ में "माउंटबैटेन : हीरो ऑफ अवर टाइम" के प्रसिद्ध लेखक रिचर्ड हो एक जगह लिखते हैं कि जिस खूबसूरत आदमी को एडविना ने पहली दफा देखा था वह शीघ्र ही उनकी जिंदगी का खास आदमी बन गया और अगले 14 सालों तक ऐसा ही बना रहा। पं. नेहरू सरलता से एडविना के लिए सबसे ज्यादा प्रिय एवं अकेले प्रेमी बन गए थे। उनका यह प्यार काफी गहरा और कई धरातलों पर प्रवाहित होता था। तत्कालीन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समाज में भी इन दोनों का विशेष स्थान था। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद पं. नेहरू नितांत अकेले से पड़ गए थे। इसके अतिरिक्त सन् 1942 में अपनी पुत्री इंदिरा के विवाह के उपरांत तो उनका यह अकेलापन उन्हें और भी अधिक कचोटता होगा। अत: यह स्वाभाविक ही है कि ऐसी परिस्थितियों में उनके जीवन में एडविना जैसी महिला मित्र का आगमन उनके लिए काफी सुकून और प्रसन्नता प्रदान करने वाला रहा होगा। दूसरी ओर एडविना भी भावनात्मक रूप से पं. नेहरू के प्रति पहले से ही गहरा लगाव अनुभव किया करती थीं। इस प्रकार दोनों के बीच प्रगाढ़ मित्रता का हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।

अपने समय के संगी-साथियों, आजादी की जंग में देश के बड़े-बड़े नेताओं की कुर्बानी, देश के बंटवारे की आग व देश की आजादी का अविस्मरणीय स्वर्णीम अवसर, स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देश को दशा व दिशा प्रदान करना आदि जैसी बड़ी व महत्वपूर्ण घटनाओं के समय पं. नेहरू को जिस सहारे और साथी की आवश्यकता थी, उसकी कमी कदाचित एडविना ने ही पूरी की थी। एडविना और नेहरू के बीच जो प्या र था उसमें बहुत गंभीरता व परिपक्वता थी कदाचित् यही कारण था कि माउंटबैटेन सब कुछ जानते और समझते हुए भी उनके बीच दीवार नहीं बने।

एडविना और पं. नेहरू ने अपना काफी समय भारत के राष्ट्रपति भवन, शिमला स्थित वायसराय भवन तथा इंग्लैंड के ब्रॉडलैंड आदि के वन-उपवनों आदि जैसे स्थानों पर एक-साथ व्यतीत किया था। पं. नेहरू जब भी इंग्लैंड जाते, तो व्यस्तता के बावजूद अपना कुछ समय एडविना के लिए अवश्य निकाल लेते थे। सन् 1949 में जब जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रमंडल सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए इंग्लैंड पहुंचे, तो वहां भी जब कभी मौका मिलता, दोनों साथ-साथ समय बिताकर बिछड़ने की कमी पूरी किया करते थे। वर्ष 1959 में नेहरू जी का जन्मदिन भी एक ऐसा ही अवसर था, क्योंकि इस वर्ष 14 नवंबर को नेहरू जी के 70 वें जन्मदिन की खुशी में एडविना ने रात्रि-भोज का आयोजन किया था।

स्वतंत्रता के बाद लॉर्ड माउंटबैटेन गवर्नर-जनरल के अपने पद से मुक्त होकर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को कार्य भार सौंपकर वापिस जाने लगे, तो उस समय उनके सम्मान में दिए जाने वाले विदाई भोज के समय पं. नेहरू को बोलने के लिए कहा गया। उस दौरान दिए गए भाषण में अन्य बातों के अलावा जब एडविना का जिक्र आया, तो नेहरू जी एक क्षण रुक कर एडविना की तरफ मुखातिब होकर बोले, 'देवताओं अथवा किसी महान देवी ने आपको सुंदरता, बुद्धि, शालीनता, आकर्षण तथा जीवन-शक्ति का महान उपहार प्रदान दिया है ......... तथा इन गुणों की स्वामिनी आप एक महान नारी हो, भले ही आप कहीं भी चली जाओ। यह प्रकृति का नियम है कि जिनके पास पहले से ही बहुत कुछ हो, उन्हें और भी मिल जाता है तथा उन्होंने आपको एक ऐसी चीज भी प्रदान की है जो इन गुणों से भी ज्यादा विरल एवं श्रेयस्कर है - मानवीय स्पर्श, मानवजाति के प्रति प्रेम, उनकी सेवा की भावना जो पीड़ित हैं, मुश्किलों में हैं। और ........... गुणों का यह विस्यमकारी मेल आपको एक जाज्वल्यमान व्यक्तित्व तथा घाव भरने वाला मृदु स्पर्श प्रदान करता है। जहां भी आप जाती हो, वहीं लोगों को हौसला प्राप्तर हो जाता है, आशा एवं प्रोत्साहन मिलता है। अगर भारत की जनता आपको दिल से चाहने लगे तथा आपको अपने में से ही एक समझने लगे और आपके यहां से जाने पर दु:खी हो जाए, तो क्या इसे आश्चर्यजनक माना जाएगा।"

एडविना के हृदय में भी नेहरू जी ने अपना एक विशेष स्थान बना लिया था। इसलिए उनके बिना रहना एडविना के लिए भी दुष्कर हो रहा था। अत: एडविना ने अपने सामाजिक कार्यों, रेड क्रॉस, बाल-रक्षा कोष और दक्षिण-पूर्व एशिया में सेंट जॉन एंबुलैंस के लिए स्वयं को सक्रिय बनाए रखा ताकि उन्हें जब-तब भारत आगमन का अवसर मिलता रहे और नेहरू जी से भी मुलाकात होती रहे। दरअसल, एडविना और नेहरू दोनों ही ऐसे मौकों की फिराक में रहते थे जिससे दोनों एक साथ समय व्यतीत कर सकें। सन् 1951 में जब एडविना भारत में थीं तो नेहरू जी ने कश्मीर यात्रा का अपना जो कार्यक्रम बनाया था उसमें एडविना भी उनके साथ थीं।

इसी प्रकार सन् 1960 में गणतंत्र दिवस के मौके पर भी पं. नेहरू ने एडविना को पत्र लिखकर उन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण दिया। जिसे उन्होंने हमेशा की तरह सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस बार गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि थे तत्कालीन सोवियत राष्ट्रपति मार्शल क्लेमेंट वोरोशिलोव। एडविना भी विशिष्ट व्यक्तियों वाले स्थान पर थीं। इस मौके पर एडविना नेहरू जी का हाथ पकड़कर वहां उपस्थित व्यक्तियों से मिली थीं। इसी प्रकार 29 जनवरी, 1960 का 'बीटिंग द रिट्रीट" समारोह भी एडविना और नेहरू जी ने साथ मिलकर ही मनाया था, परन्तु दुर्भाग्यवश यह इन दोनों की अंतिम मुलाकात थी। जिसके बारे में विधाता के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता था। अपनी इस अंतिम भारत यात्रा से लौटने के कुछ दिनों बाद ही वे अस्वस्थ हो गईं इसलिए उन्हें 20 फरवरी को उत्तरी बोर्नियो के जैसलटन नगर के एक अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, लेकिन अगले दिन जब वे काफी देर तक सोकर नहीं उठीं, तो उनकी खैर-खबर लेने के लिए देखा गया, लेकिन सबको यह जानकर काफी दु:ख हुआ कि एडविना का देहावसान हो गया था।

भारत में नेहरू जी को जिस समय एडविना की मृत्यु के बारे में पता चला, उस समय वे ब्रिटेन के विश्वविख्यात इतिहासकार एवं शिक्षाविद् अर्नाल्ड टॉयनबी के भाषण 'इतिहास के सांचे में भारत" के लिए 'इंडियन कॉउंसिल फॉर इंटरनेशनल अफेयर्स" में जाने की तैयारी कर रहे थे। यह दु:खद खबर सुनते ही नेहरू जी को गहरा धक्का लगा और वे बेसुध-निढाल से हो गए। उनकी जीवनी लिखने वाली मैरी सेटन भी वहां मौजूद थीं। इस बारे में वे लिखती हैं, ''नेहरू जी का चेहरा भाव-शून्य हो गया था तथा ऐसा लग रहा था कि वे भीतर की गहराई में कहीं डूब गए हैं। उन्हें इस बात का कोई एहसास नहीं था कि उनके निकट कौन-कौन व्यक्ति हैं तथा वे क्या कर रहे हैं।"" परन्तु नेहरू जी ने शीघ्र ही जैसे-तैसे स्वयं को संभाला और कुछ सोचकर अर्नाल्ड टॉयनबी के भाषण में जाने का निर्णय लिया। बाद में भारतीय संसद ने एडविना को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की और मौन भी रखा। सांयकाल में पं. नेहरू और उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने चर्च में जाकर भी एडविना की आत्मा को शांति देने के लिए प्रभु से प्रार्थना की।

एडविना की यह इच्छा थी कि उनके अंतिम संस्कार के लिए उनका शव दफनाया न जाए, बल्कि सागर में प्रवाहित कर दिया जाए। तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने एडविना की यह इच्छा पूरी करने का फैसला किया। जब यह बात पं. नेहरू को पता चली, तो उन्होंने भारतीय नौ-सेना के एक युद्धपोत 'त्रिशूल" को फौरन ब्रिटेन के लिए रवाना कर दिया। जिस समय एडविना को जल समाधि दी गई और ब्रिटेन की ओर से फूल मालाएं अर्पित की गईं, उस नेहरू जी की ओर से भी भारतीय नौ-सेना के त्रिशूल से पुष्पार्पण किया गया था।

अपनी इस विशेष मित्र को खोकर नेहरू जी को गहरा आघात गा था। एडविना की मृत्यु के बाद उनकी और एडविना की लगभग 15 साल पुरानी मित्रता व प्रेम भौतिक रूप से समाप्त हो गया था। इसके बाद नेहरू जी भी बहुत अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाए तथा 27 मई, 1964 में उनकी भी मृत्यु हो गई।