Wednesday, November 3, 2010

मछली या अलसी !! किसे चुनें किसे न चुनें?? एक निष्पक्ष व तुलनात्मक अध्ययन

मछली या अलसी !! किसे चुनें किसे न चुनें?? एक निष्पक्ष व तुलनात्मक अध्ययन
मछली के बड़े व्यवसायी और उनके समर्थक कई दशकों से यह सिद्ध करने की कोशिश करते आये हैं कि वानस्पतिक ओमेगा-3 ए.एल.ए. जो एक आवश्यक वसा अम्ल है ( यानी यह शरीर में निर्मित नहीं होता है व इसे भोजन द्वारा ही ग्रहण करना नितांत आवश्यक है) शरीर में ई.पी.ए और डी.एच.ए. (जो मछलियों में पाये जाते हैं) का वांछित निर्माण करने में सक्षम नहीं है। यदि ऐसा है तो इसका क्या सबूत हैं, जब भी उनसे पूछा जाता है तो वे ठीक से जवाब दे नहीं पाते हैं या कभी कहते हैं की ए.एल.ए. का बहुत ही थोड़ा भाग ई.पी.ए. और डी.एच.ए. में परिवर्तित हो पाता है, कभी कहते हैं कि कुछ लोग ई.पी.ए. और डी.एच.ए. का निर्माण नहीं कर पाते हैं।

ये प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ई.पी.ए. हमें स्वस्थ और निरोग रखने हेतु आइकोसेनोइड हार्मोन बनाने में सहायक है और डी.एच.ए. मस्तिष्क व ऑखों के विकास तथा मस्तिष्क की सारी कार्य प्रणाली, शुक्राणुओं के निर्माण, हृदय की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। यदि हमारा शरीर ए.एल.एसे ई.पी.ए और डी.एच.ए. बनाने में सक्षम है तो हमें मछली या इसका तेल खाने की कोई आवश्यकता नहीं है परन्तु यदि हमारा शरीर ई.पी.ए. और डी.एच.ए. कोबनाने में सक्षम नहीं है तो हम सभी को मछली और उनका तेल खाना नितान्त आवश्यक है।

मछलियों के व्यवसाइयों और उनको समर्थन देने वालों का समुदाय बहुत अमीर,बड़ा और प्रभावशाली हैऔर अपने स्वार्थों के निहित कई दशकों से निरंतर अंतरराष्ट्रीय मीडिया, सरकारी संस्थाओं के उच्चाधिकारियों, चिकित्सकों और राज नेताओं पर पानी की तरह दौलत लुटा रहा है। ये सारे लोग पूरी तरह इन व्यवसाइयों के चंगुल में हैं जिसके परिणाम स्वरूप सारे पत्र पत्रिकाएं, हैल्थ जरनल्स मछली की प्रशंसा करने वाले लेखों से भरे पड़े हैं। सारे टी.वी. चेनलों पर समय समय पर बड़े बड़े पत्रकार और चिकित्सक मछली की तारीफों के पुल बांधते दिखाई देते हैं तथा यथार्थ व वैज्ञानिक लगने वाले पर आधे झूंठे तथ्य प्रस्तुत कर जनता को गुमराह करते हैं। मछली तेल के संपुट मुंहमांगे दामों पर बेचे जा रहे हैं। आप देखिये कि मछली ओमेगा-3 की पर्याय बन गई है और आवश्यक वसा अम्ल ओमेगा-3 के महान वानस्पतिक स्रोत अलसी और चिया को कोई जानता ही नहीं है। अलसी और चिया की शोध, जागरुकता और प्रोत्साहन पर शायद ही कोई सरकार दौलत खर्च करती है। मेडीकल पाठ्यक्रम व पुस्तकों पर से चुपचाप अलसी और चिया के नाम मिटा दिये गये हैं।

आइये आज निष्पक्ष होकर हम यथार्थ जानने की कोशिश करते हैं। हमने ओमेगा-3 वसा अम्लों पर हुए परीक्षणों के बारे में काफी अध्ययन किया है, हमारी एन जी ओ संस्था “अलसी चेतना यात्रा” द्वारा की गई शोध और राष्ट्रीय स्तर पर किये गये सर्वेक्षण के नतीजों को भी ध्यान में रखा है और उडो इरेस्मस की पुस्तक “फैट्स दैट हील एण्ड फैट्स दैट किल” को विस्तार से पढ़ा है। तथ्य यह बताते हैं कि पिछले कई दशकों से हमारे भोजन में ए.एल.ए. की मात्रा बहुत ही कम हो गई है, अमेरिका की स्थिति तो सबसे ही खराब है। जब हमारे शरीर में ए.एल.ए की मात्रा बहुत ही नगण्य है तो ई.पी.ए. और डी.एच.ए. का निर्माण भी तो उसी अनुपात में होगा।

जब 1950 में डॉ. योहाना बुडविज ने वसा अम्लों को पहचानने की पेपर क्रोमेटोग्राफी की तकनीक विकसित की और ओमेगा-3 आवश्यक वसा अम्ल ए.एल.ए की खोज की थी। डॉ. बुडविज ने पता लगाया था कि ए.एल.ए. के महान स्रोत अलसी, अखरोट और चिया के बीज है।

डॉ . बुडविज का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए सात बार चयनित हुआ था। डॉ . बुडविज ने ट्रांसफैट युक्त पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजिनेटेड वसा अम्ल यानी मार्जरीन या हिन्दी भाषा में वनस्पति घी के हमारे शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में खूब अध्ययन किया था । वे मार्जरीन को प्रतिबंधित करना चाहती थी जिसके कारण मार्जरीन बनाने वाले उनके दुश्मन बन गये थे। मछली व्यवसाइयों का समुदाय भी डॉ. बुडविज की खोज से बहुत परेशानी में था क्योंकि वह मछली नहीं बल्कि अलसी को प्रोत्साहन दे रही थी। इसलिए उन्होने भी बुडविज के विरूद्ध चक्रव्यूह रचा, उन्हे प्रताड़ित किया और उनके विरुद्ध मुकदमे दाखिल किये। पर अंत में विजय सत्य की ही हुई। आज ठण्डी विधि द्वारा तैयार हुआ स्वास्थ्यप्रद अलसी का तेल मिलने लगा है और लोग इसे अपना रहे हैं।

हमें अक्टूबर, 2002 की ब्रिटिश जरनल ऑफ न्यूट्रीशन में पुरुषों और स्त्रियों पर हुए दो परिक्षणों की विस्तृत रिपोर्ट पढ़ने को मिली। पहला परीक्षण स्त्रियों पर किया गया। स्त्रियों ने अपने शरीर में विद्यमान ए.एल.ए. के 36% भाग को लंबी लड़ वाले ओमेगा-3 वसा अम्लों क्रमशः 21% ई.पी.ए., 6% डी.पी.ए. व 9% डी.एच.ए. में परिवर्तित किया। दूसरे परीक्षण में पुरुषों ने स्त्रियों के मुकाबले आधे 16% ए.एल.ए. को क्रमशः 8% ई.पी.ए व 8% डी.एच.ए. परिवर्तित किया। स्त्रियों ने पुरुषों के मुकाबले दोगुने ए.एल.ए. को ई.पी.ए व डी.एच.ए. में परिवर्तित किया शायद इसलिए कि उसे दो मस्तिष्कों और दो दृष्टि-पटलों (स्वयं तथा उसके शिशु के) को पोषण देना होता है।

इन परीक्षणों में यह भी देखा गया कि कुछ स्त्रियों में, जो परिवार नियोजन हेतु इस्ट्रोजन की गोलियां नियमित ले रही थी, ए.एल.ए. का परिवर्तन शीघ्र तथा सहजता से हुआ। शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पर पहुंचे कि इस्ट्रोजन ए.एल.ए. के परिवर्तन को गति देते हैं तथा रजोनिवृत्ति के बादस्त्रियों को और पुरुषों को यदि थोड़ा इस्ट्रोजन दिया जाये तो ए.एल.ए. का परिवर्तन शीघ्र व सहज होगा।
अलसी का नियमित सेवन करने वालों के शरीर में पर्याप्त लिगनेन रहता है क्योंकि अलसी लिगनेन का सबसे बड़ा स्रोत है। लिगनेन इस्ट्रोजन का प्रतिरूप है और दुर्बल इस्ट्रोजन की तरह कार्य करता है व स्त्रियों में रजोनिवृत्ति के पहले यह इस्ट्रोजन की मात्रा कम करता है तथा रजोनिवृत्ति बाद इस्ट्रोजन की मात्रा बढ़ाता है। अतः अलसी सेवन करने वालों के शरीर में पर्याप्त इस्ट्रोजन का प्रतिरूप लिगनेन और भारी मात्रा में ए.एल.ए. भी होता है और ए.एल.ए. बड़ी सहजता व शीघ्रता से ई.पी.ए व डी.एच.ए. का निर्माण करता है। साथ में लिगनेन एक बलवान विषाणु-रोधी, कीटाणु-रोधी, फफूंद-रोधी, कैंसर-रोधी, कॉलेस्ट्रोल-रोधी, ल्यूपस-रोधी, डायबिटीज-रोधी, शोथ-हर और प्रति-ऑक्सीकारक भी है। यह एक महान पोषक तत्व है। यह अलसी खाने के अतिरिक्त लाभ हैं।

शोधक्रताओं ने उपरोक्त परीक्षणों के आधार गणना करके यह बताया कि यदि पुरुषों को 3 बड़ी चम्मच और स्त्रियों को 2 बड़ी चम्मच अलसी तेल नियमित दिया जाये तो उनके शरीर में क्रमशः मछली के 11 और 17 बड़े केप्स्यूल जितना इ.पी.ए. और डी.एच.ए. प्रति दिन बनेगा।

मछली के संपुट खाने में एक और बड़ी परेशानी है। इसमें पारा, पी.सी.बी., कीटाणुनाशक आदि की मात्रा प्रदूषण के रूप में रहती है। हॉलांकि इन दूषित पदार्थों को निकालने के लिए मछली के तेल को परिष्कृत किया जाता है। लेकिन परिष्कृत करने की प्रक्रिया में मछली का तेल को उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है जिससे वह और ज्यादा खराब तथा विषैला हो जाता है,कारण यह है कि ई.पी.ए.और डी.एच.ए. प्रकाश, ऑक्सीजन और तापमान के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं, ए.एल.ए से भी पांच गुना ज्यादा। अत: खराब और टॉक्सिक मछली तेल के संपुट खाने से अच्छा है हम स्वच्छ जल में पैदा हुई मोटी मछलियां खायें या जैविक ठण्डी विधि द्वारा निकाला हुआ एकल-निष्कासित अलसी का तेल खायें।
शरीर में ई.पी.ए. और डी.एच.ए. के निर्माण को निम्न घटक प्रभावित करते हैं।

• यदि शरीर में ओमेगा-6 वसा अम्ल की मात्रा ज्यादा होती है तो ई.पी.ए.और डी.एच.ए. का निर्माण कम होता है। परन्तु यदि ओमेगा-3 ए.एल.ए ज्यादा हो तो स्वाभाविक है कि ज्यादा ई.पी.ए. और डी.पी.ए. बनेगा।
• विटामिन बी-3, बी-6, और सी तथा जिंक और मेग्नीशियम इनके निर्माण के लिए आवश्यक है और यदि शरीर में इनकी कमी है तो निर्माण कम होगा।
• यदि हमारे भोजन में कार्ब की मात्रा ज्यादा है तो भी ई.पी.ए.और डी.एच.ए. का निर्माण कम होगा लेकिन यदि हम आहार में प्रोटीन ज्यादा ले तो इनका निर्माण ज्यादा होगा।

Tuesday, November 2, 2010

अलसी चालीसा


अलसी चालीसा पढ़ने के लिए इस पर चटका करें।

Wednesday, August 18, 2010

आँखों पर डायबिटीज की कुदृष्टि

आँखों पर डायबिटीज की कुदृष्टि



The eyes are the mirror of the soul. Take care of your eyes with gentleness.

             Aishwarya.       

 

आँखें हमारे शरीर का सबसे आवश्यक अंग है। आँखें नहीं तो जीवन में  कुछ भी नहीं  है। आँखें नहीं तो जिंदगी व्यर्थ हो जाती है, फ्यूज हो जाती है। आँखों पर हमारे कवियों, शायरों और साहित्यकारों ने आँखो के बारे बहुत कुछ लिखा है, जैसे ये गीत…


  


         

 

 

 

इसलिए डायबिटीज के रोगियों को अपनी आँखों की देखभाल में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिये क्योंकि  मधुमेह के अन्धेपन या दृष्टि-दोष का मुख्य कारण है, आँखों पर मधुमेह का दुष्प्रभाव जिसे डायबिटिक रेटीनोपैथी कहते है। टाइप-2 डायबिटीज के रोगियों में करीब 60 प्रतिशत से ज्यादा लोगों में रेटीनोपैथी पाई जाती है।

 

 

इसे जानना अति आवश्यक इसलिए है कि मधुमेह के कड़े नियंत्रण द्वारा रेटीनोपैथी को रोका जा सकता है और यदि सही समय पर जाँच करके रेटीनोपैथी का निदान हो जाये तो इसका इलाज संभव है यानी अन्धेपन को रोका जा सकता है। 

 

 मधुमेह के रोगी को लम्बी अवधी तक रक्त शर्करा ज्यादा रहे और उपचार भी न लिया जाये तो दृष्टिपटल दोष या रेटीनोपैथी नामक रोग हो जाता है जो आगे चलकर रोगी में अन्धापन लाता है। रक्त में ग्लूकोज ज्यादा होने से दृष्टिपटल या रेटीना की रक्त वाहिकाएँ व केशिकाऐं क्षतिग्रस्त हो जाती है और जिससे रेटीना को आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति प्रभावित हो जाती है।

 

रेटीना आँख के पिछले हिस्से में प्रकाश के प्रति संवेदनशील एक पर्दा होता है। जो दृष्य हम देख रहे हैं, उसका प्रतिबिम्ब आँखों के रेटीना पर बनता है। रेटीना इस प्रतिबिम्ब को विद्युत संकेतों में परिवर्तित कर ओप्टिक नर्व द्वारा मस्तिष्क के विजुवल कोर्टेक्स को भेजती है। मस्तिष्क दोनों आँखों से प्राप्त हुए संकेतों को मिलाकर एक त्रि-आयामी प्रतिबिम्ब तैयार करती है। यह त्रि-आयामी प्रतिबिम्ब ही हमें किसी भी वस्तु की दूरी या गहराई का अनुभव करवाता है। बिना रेटीना के हमारी ऑखे मस्तिष्क से सम्पर्क और समन्वय नहीं कर सकती यानी रेटीना के बिना किसी भी चीज को देखना असंभव है।

 

डायबिटिक रेटीनोपैथी भी आरंभिक अवस्था जिसे पृष्ठभूमि रेटीनोपैथी कहते है, में रेटीना की रक्त वाहिकाएँ क्षतिग्रस्त हो जाती है। जिसके कारण वाहिकाओं से तरल दृव्य का रिसाव होने लगता है। जिससे दृष्टि में धुंधलापन आ जाता है। आगे चलकर प्रोलिफरेटिव रेटीनोपैथी हो जाती है  जिसमें रेटीना और कभी-कभी आँख के अन्य हिस्सों में नई असामान्य   रक्त वाहिकाऐं बन जाती है। यदि ये वाहिकाऐं आँख के केन्द्र में  मौजूद स्पष्ट दृव्य (Vitreous Humor) में खून स्रावित करने लगती है तो प्रकाश रेटीना तक नहीं पहुँच पाता है और देखने वाले को कभी-कभी धुंधला नजर आता है। यदि खून धीरे-धीरे अवशोषित हो जाए तो नजर फिर से सामान्य हो सकती है। लेकिन यदि खून का बहना जारी रहता है तो नजर तब तक धुंधली बनी रहती है जब तक कि समस्या का इलाज न हो जाए। रेटीनोपैथी के बढ़ने में उच्च रक्तचाप एवं मूत्र में अल्ब्यूमिन विसर्जित होने का भी बड़ा हाथ होता है।

 

यदि उपचार न किया जाये तो रेटीना के पीछे बनी नई रक्त वाहिकाओं के सिकुड़ने और नये ऊत्तक बनने के फलस्वरुप रेटीना आँख  के पिछले सिरे अलग हो जाती है, इसे रेटीनल डिटेचमेंट कहते हैं। यदि रेटीनल डिटेचमेंट का समय पर उपचार न किया जाये तो रोगी हमेशा के लिए अंधा हो जाता है।

 

रेटीनोपैथी के कारण मेक्यूला, जो रेटीना का वो मध्य भाग है जो हमारे पढ़ने की दृष्टि को नियंत्रित करता है, में तरल दृव्य के रिसाव के कारण सूजन आ जाती है जिससे दृष्टि धुंधली हो जाती है।

 

डायबिटीक रेटीनोपैथी के लक्षण

·        आरम्भिक अवस्था में सामान्यतः कोई लक्षण नहीं होते।

·        कभी-कभी पढ़ते या कार चलाते समय केन्दि्रय दृष्टि का ह्रास होता है, रंग पहचानने में परेशानी होती है और नजर में धुंधलापन आ जाता है। रक्त वाहिकाओं से रक्त स्त्राव होने के कारण कभी-कभी दृष्टि में छोटे धब्बे या तैरते हुए कण दिखाई देते है जो कुछ हफ्तों या महीनों में ठीक भी हो जाते है। संपूर्ण अन्धापन। 

 

रेटीनोपैथी का निदान  

 

जब आप अपनी आँखों की जाँच के लिए नैत्र चिकित्सक के पास जायेंगे तो वह अनेक विधियों में से किसी एक के माध्यम से आपके रेटीना की जाँच करेगा। वह आपकी आँखों में दवा डालकर आँखों की पुतली का विस्तारण करेगा और ऑफ्थेल्मोस्कोप से आपके रेटीना की जाँच करेगा।  इसमें से प्रकाश की एक किरण आपकी आँख में डाली जाती है ताकि आँख के पीछे मौजूद रेटीना को अच्छी तरह देखा जा सके। नैत्र चिकित्सक एक स्लिट लैम्प व माइक्रोस्कोप नामक उपकरण द्वारा भी आँख के अन्दरूनी हिस्से को बड़ा करके देख सकता है।

 

अगर रेटिना में कोई गड़बड़ लगती है तो डाक्टर आपकी आंख का लोरिसिन एंजियोग्राम करना चाहेंगे। लोरिसिन नामक एक डाई को आपकी बाजू में इंजैक्ट कर दिया जाता है जिसे आपके आंखों तक पहुंचने में कुछ ही सैकेंड लगते हैं। तकनीशियन आपके रेटिना की कई तस्वीरें लेते हैं। इन तस्वीरों से पता चलता है कि आपकी आंखों में कोई लीकेज या असामान्य रक्त वाहिकाएं मौजूद तो नही है। आपके डाक्टर को ये सही-सही मालूम होगा कि रेटिना के किन हिस्सों का इलाज किए जाने की जरूरत है। जब एक बार रिसाव वाली इन जगहों या नई रक्त वाहिकाओं का सही-सही पता चल जाता है तो इन्हें लेजर के इस्तेमाल से ठीक किया जा सकता है। इससे नजर जाने का खतरा नहीं रहता।

 

उपचार

 

रेटीनोपैथी का उपचार लेजर फोटो को-एगूलेशन द्वारा किया जाता है। याद रखें समय पर किया गया उपचार आपको अन्धेपन से बचा सकता है। लेजर उपचार से 90 प्रतिशत लोगों को अभूतपुर्व फायदा होता है। इसलिए समय-समय पर आँखों की जाँच करवाते रहें।

 

आजकल ग्रीन लेजर का प्रयोग ज्यादा हो रहा है, यह अत्याधुनिक एवं दर्द रहित उपचार है, लेकिन यदि रोगी को मोतियाबिन्द हो तो ग्रीन लेजर द्वारा उपचार संभव नहीं है।

 

रेड लेजर द्वारा उपचार मोतियाबिन्द के रोगियों में भी किया जा सकता है। इसमें रोगी को बेहोश किया जाता है।

मधुमेह के का लेंस मरीजों में ब्लड शुगर के घटते-बढ़ते रहने के कारण आँख कभी फूल जाता है और कभी सिकुड़ जाता है और आँखों के सामने धुँधलापन छा जाता है। कभी-कभी इन्सुलिन चिकित्सा शुरू करने पर भी ऐसा होता है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है अतः डरने की जरूरत नहीं है। यह एक क्षणिक बात है और इससे ऑखो को कोई नुकसान नहीं पहुँचता।

 

बचाव के मुख्य उपाय

·        मधुमेह के रोगी को हर 6 महिने में नैत्र विशेषज्ञ से आँखों की जाँच करवानी चाहिए।

·        मधुमेह का कठोर नियंत्रण।

·        रक्त चाप का नियंत्रण।

·        मूत्र में एलब्यूमिन की जाँच।

·        लिपिड प्रोफाइल कराकर उपयुक्त दवा लें।

·        ओमेगा-3 फैट युक्त भोजन खांये जैसे अलसी या मछली।

·        एन्टीऑक्सीडेन्टस का उपयोग करें।

·        उचित व्यायाम करें।

·        खूब सब्जियां, ताजे फल और अंकुरित अन्नों का सेवन करें।